सोमवार, 18 अगस्त 2014

व्यथा संरक्षक की ०२ अगस्त २०१४

यह पंक्तियां एक संरक्षक की जीवन व्यथा है जो एक बेटा-बेटी को पालता है और उनके वयक्तिगत हठ जिसमें उनकी अपनी  भविष्यमयी हानि है से वयथित होकर उनको अपनो से अलग करता है :-

सुमन, सुमन नहीं हैं उस उपवन का,
सीँचाँ है जिसे जिस माली ने,
मौजूँ नहीं सुमन, माली के उस उपवन का।

सोच-सोच पौध जमाया था,
वृक्ष बन सुमन खिलेगा उपवन में,
मन ही मन हर्षाया था,
हर्षयोग बनाने को पौध को सींचाँ,
रोप-रोप पौध एक स्वप्न खींचा,
स्वप्न के अलग-अलग रोप की सोंच को खींचा,
खींच-खींच स्वप्न सोच,मन उलसाया था,
हर्षयोग बना वियोग, जब पौध अकुलाया है,
अकुलायित पौध ने नया रूप आज दिखलाया है,
खिला सुमन मिला नहीं माली को,
सुमन मन हर्षित है पूजा में अर्पण को,
क्रमबद्ध है आज सुमन पूजा के तर्पण को,
तर्पण के अर्पण की माला है चढ़ने को बलिवेदी पर,
है वेदना माली की आज यहीं,
बलिवेदी पर आज सुमन, अन्यत्र की वेदी के,
व्यथित मन माली है, उपवन से मुख मोड़ लिया,
रोपा था जिस पौधे को सुमन की खातिर,
आज हर नाता उससे तोड़ दिया,
सुमन गया उपवन हुआ पराया,
आज साथ नहीं माली से उपवन का।

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