मत बनो रहबर किसी का,
यहाँ सब मतलब रखते है,
निकल जाये हाथ उसका,
फिर कोई नही है किसी का।
जमाना है खुदगर्जी का,
कोई नहीं है किसी का,
स्वार्थ की सरपरस्ती है,
नाम है सेवादारीं का,
भाई,बहन,बन्धु,सखा,
सब रिश्ते है मतलब के,
मतलब है जबतक उनका,
जुँबा पर हर वक्त नाम उन्हीं का,
मतलब निकल जाते ही,
शेष नहीं कुछ रह जाता,
बन जाती है जिंदगी फसाना,
बस लांछन ही उसमें रह जाता,
मत बनो रहबर किसी का,
यहाँ सब मतलब रखते है,
निकल जाये हाथ उसका,
फिर कोई नही है किसी का।
कापीराईट अधिकार सुरक्षित-
रचियता - पुष्पेन्द्र सिँह मलिक "नादान"
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