सोमवार, 18 अगस्त 2014

उद्गार सामाजिक चोट से ०४ अगस्त २०१४


मेरी यह पंक्तियां आजकल विभिन्न जगहों पर हो रहे दंगे फसाद से पहुँच रही सामाजिक चोट का उद्  गार है :-

खतरे में हैं आजाद ये भारत, हाय ये कैसी बीमारी,
मानवता हुई दागदार और इंसान हुआ स्वार्थी।।

आलोचक हूँ उन शब्दों का,जो अर्थ लिये हो द्विअर्थी,
बाहर से तो रोशन चेहरा,अन्दर से है मुर्दापरस्ती।१।

भीड़ भरी जनता में,अपनो को खोजता है,
है क्यों परेशान अपनो के लिये,अपने ही तो है घाती।२।

अपने ही हैं जो, अपनो को बाँट रहे,
जाति और धर्म पर अपनो को छाँट रहें।३।

एक जर्रे लालच कि खातिर गिरा है मानव आज,
इंसानियत हुई बदनाम और खत्म हुई इंसान परस्ति।४।

जेब और जेग कि खातिर, जोकि बन गया है,
चूसता है खून अपनो का, मानवता कर दी सस्ती।५।

मानवता हुई दागदार और इंसान हुआ स्वार्थी।।

कापीराईट अधिकार सुरक्षित :- पुष्पेन्द्र सिँह मलिक "नादान"



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