सोमवार, 18 अगस्त 2014

अभिव्यक्ति ०५ अगस्त २०१४


मेरी ये पंक्तियां ऐसे व्यक्ति के हालात का चित्रण करती है जो अपनो का सताया हुआ है और विवश हैं :-

कैसे लिखूँ, कैसे लिखूँ आदि और अन्त कहानी के।
जिंदगी एक कहानी है जिंदगानी के सफर की,
कैसे लिखूँ,कैसे लिखूँ आदि और अन्त कहानी के।।

किस्से लम्बे है ये तेरी मेरी कहानी के,
सोचता हूँ जब बैठकर लिखने को हाल-ए-ब्याँ,
शब्द मिलते नहीं लिखने को सफर में,
कैसे लिखूँ,कैसे लिखूँ आदि और अन्त कहानी के।।

रिश्ते जो बनाये खुदा ने खून से जोड़कर,
अच्छे निभायें अपनों ने वक्त पर मुँह मोड़कर,
बन्धन तोड़ दिये सारे खून कि निशानी के।।
कैसे लिखूँ,कैसे लिखूँ आदि और अन्त कहानी के।।

अपनो ने किया गिल्टी जिसे,गैरों ने सराहा है,
जब ठुकराया अपनों ने परायों ने दिया सहारा है,
बस आज वहीं है अपने कल थे जो पराये मेरी कहानी से।।
कैसे लिखूँ,कैसे लिखूँ आदि और अन्त कहानी के।।

मुफलिसी में जी लि जिंदगी अपनों के लिये,
ना रहे घर रहे दर बदर बनाने को विरासत,
जब अपनों ने कि सियासत पन्ने खत्म हुए कहानी के।।
कैसे लिखूँ,कैसे लिखूँ आदि और अन्त कहानी के।।
कापीराईट अधिकार सुरक्षित :- पुष्पेन्द्र सिँह मलिक "नादान" 


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