शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

शासक हुआ धृतराष्ट्र, ०७ अगस्त २०१४

यह पंक्तियां मेरी आज प्रदेश कि अराजकता के हालात व असफल कानून व्यवस्था के लिए जिम्मेदारी का केन्द्र प्रदेश के शासक को मानते हुए उन्हें कर्तव्य बोध दिलाने हेतु समर्पित है :-

शासक हुआ धृतराष्ट्र,काज मशीनरी सो रही।
अत्याचार के बढ़ते जंगल से जनता सारी रो रही।।

राजकी लूट खसोट से तस्त्र जो ऊबी जनता,
बदला निजाम सुशासन को,अब कुशासन से डूब रही।
शासक हुआ धृतराष्ट्र,काज मशीनरी सो रही।
अत्याचार के बढ़ते जंगल से जनता सारी रो रही।।१।।

नवयौवन के सब्जबाग से विकास स्वप्न दिखलाया था,
विकास हुआ ना विश्वास रहा ना जनता की फूल साँस रही।
शासक हुआ धृतराष्ट्र,काज मशीनरी सो रही।
अत्याचार के बढ़ते जंगल से जनता सारी रो रही।।२।।

अपराधी युक्त है (राज्य) अपराधी मुक्त है हर चौराहा नीलाम हुआ,
शासन प्रशासन हुआ विफल,आज ये नगरी देख रही।
शासक हुआ धृतराष्ट्र,काज मशीनरी सो रही।
अत्याचार के बढ़ते जंगल से जनता सारी रो रही।।३।।

न आयें अस्मत पे दाग कहीं,किसी खिड़की किसी झरोके से,
ना निकलूँ आज बचे लाज आँगन में हर बहना ये सोच रही।
शासक हुआ धृतराष्ट्र,काज मशीनरी सो रही।
अत्याचार के बढ़ते जंगल से जनता सारी रो रही।।४।।

लोकतंत्र के प्रहरी बनकर जो बैठे हैं समाजवाद के संरक्षक,
चुनौती हैं दुःशासन कि आज आपको पुकार रही।
शासक हुआ धृतराष्ट्र,काज मशीनरी सो रही।
अत्याचार के बढ़ते जंगल से जनता सारी रो रही।।५।।

कृष्ण के वंशज कहलाते हो,हर अबला की धीर धरो,
ना उतरे अब चीर चरित्र का हर द्रोपदी पुकार रहीं।।
शासक हुआ धृतराष्ट्र,काज मशीनरी सो रही।
अत्याचार के बढ़ते जंगल से जनता सारी रो रही।।६।।

कापीराईट सर्वाधिकार सुरक्षित :-
पुष्पेन्द्र सिँह मलिक "नादान"

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