जिंदगी ना जाने कहाँ से कहाँ गयी और क्या हो गयी,
देते है दोष जमाने को,अपनो मे दुनिया अब बेगानी हो गयी,
रिश्तों की नींव दरकती है आज मतलबी फसानों पर,
महफिल तो क्या सजे,दोस्तों की दोस्ती जाने कहाँ खो गयी,
वादे और बातें कहाँ कीमत रखती है आज सिक्कों के बाजार में,
चंद यादे है दोस्ती की आज क्रान्ति और कांती के आजार में।।
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