गुरुवार, 13 जुलाई 2017

प्यार के लिये इज्जतदार व्यक्ति की अभिव्यक्ति दिनाँक १४ जुलाई २०१७

दिल मे हसरत होती है बहुत,
लेकिन बहुत मजबूर होता है,
एक अच्छा इंसान बेचारा,
इजहारे वक्त किसी से यूँ ही मायूस होता  है ।।

होते है अरमाँ वृहद जिगर भी विशाला,
टूटकर बिखरते है जज्बात जब
दिल की जगह दिमाग से ले काम,
बदल जाते है वो जनाबे आला ।।

निगाहें देखकर उसकी ओर,
आज भी उमंग भर आती है,
मुक़द्दर की कहानी कहूँ अथवा
बेबसी नाम दूँ उसको डर है जिसका,
इज्जत है तिरछी नजर से नीलाम नजर आती है ।।

सोमवार, 29 मई 2017

आज इंसा के करतब व सीख दिनाँक ३० मई २०१७

पढ़ते सुनते सब रामायण, बने न राम से पावन है,
रावण जो जलता देख रहे, उनमें भी लाखों रावण है,
चुरती है आज भी सीतायें, पर पर्व मनायें जाते है,
और रीत निभाली जाती है।।

हम में से कितने भरत बने, सीता उर्मिला सी नारी कितनी,
सीखा क्या हमने विभीषण से, सती सलोचना सी नारी कितनी,
कैकयी को बुरा भला कहकर, प्रभु भक्त कहाये जाते है,
और इति समझली जाती है।।

जब दिन दिवाली का आयें, सज धर नर घर तैयार हुयें,
अति लक्ष्मी ना ठकुरायें, उजियारे घर और द्वार हुयें,
सब धन की पूजा करते है, ओर इंसान ठकुरायें जाते है,
क्या रीत निराली भावी है।।

अब होलिका जो आती है, होली का संदेश सुनाती है,
द्वेष ईर्ष्या हवन करो, कह होलिका जल जाती है,
नृसिँह को दुनिया पूजे है, हिरणाकुश मारे जाते हैं,
(अपना अहम जगाने को) थोड़ी सी पीली जाती है।।

अति पावन त्योहार है रक्षा बंधन का, भाई-बहन की प्रीत निभाने का,
बहन भाई को राखी बाँधती आयी है, अब नया दस्तूर है नये जमाने का,
इस राखी के परदे में राखी के ही पाप छिपाये जाते है,
क्या रीत चली निराली है।।

युवकों व युवतियों सुनलो मत फैशन के दास बनों तुम,
परदेशी तहजीब मर फँसकर स्वयं का नहीं विनाश करो तुम,
क्यूँ अर्धनग्न रहने वाले अब सभ्य कहाये जाते हैं,
इसलिये बेशर्मी पायी जाती है।।

सोमवार, 24 अप्रैल 2017

सुकमा नक्सली हमले के विरोध में दिनाँक २५ अप्रैल २०१७

कैसा होता है 56" सीना,
एक बार हमको भी दिखला दो।।

कहीं नक्सली कही जिहादी,
कारण कोई हो सिर्फ मरे सिपाही,
ये घड़ियाली आँसू है जब तक,
तब तक मूर्तरूप न दिखे कार्यवाही,
ये सीमा है यहाँ कागज के प्रमाण नही सजते,
चंद सिक्के खनकाकर अरमान नही सजते,
पापा पापा कहते गुड़िया सो जाती है,
थोड़ी सयानी सी होती सपनो में खो जाती है,
बेटा बचपन खो देता है,श्रृंगार सुहागन खो जाती है,
बूढ़े हुये माँ-बाप ना जीते है ना मरते है,
देख सफेद लिबास जवानी का दिन बहुत अखरते है,
जिनको आदत हो खेले खून की होली,
उनको काव्य में श्रंगार अच्छे नही लगते,
हर बार वही भाषा वही निन्दा की बोली,
जब तक न दिखे असर वार अच्छे नही लगते,
शहीद हुआ नही कोई बेटा शासकी घरद्वारों से,
शायद दखल दिखता नही इसी लिये आतंकी गलियारों में,
लोकतंत्र की परछाई देखों कुलीनतंत्र का कुहासा है,
सत्ता के नायकों में देखो. परिवारी व्याधा है,
शायद मरा नही कोई शासन के पहरेदारों से,
क्योंकि लड़ता है सैनिक परम्परागत परिवारों से,
कभी सुकमा नक्सली हमला,कभी पत्थर चलते काश्मीर में,
क्या करना है अन्तिम क्षण की अन्तिम नीति हमको भी समझा दो,
बहुत हुआ अब कैसा होता है 56" सीना,
एक बार हमको भी दिखला दो।।

मेरे गाँव पर मुझे प्यार आता है दिनाँक २४ अप्रैल २०१७

मेरे गाँव पर मुझे प्यार आता है,

बचपन की यादों का,ज्यों ज्यों ज्वार आता है,
मेरे गाँव पर मुझे प्यार आता है।।

वो मेरे खेत ओ खलियान,
जिनमे पंछी करते कलरव गान,
देते वो ऐसी तान,विह्नगम संगीत स्वर आता है।
बचपन की यादों का,ज्यों ज्यों ज्वार आता है,
मेरे गाँव पर मुझे प्यार आता है।।

बैलों के गले की घंटी,जब मयताल बजती है,
खेतों में मेहनतकश हरियाली यों सजती है,
क्या सावन क्या भादों, चमनबन खलियान गुलजार नजर आता है
बचपन की यादों का,ज्यों ज्यों ज्वार आता है,
मेरे गाँव पर मुझे प्यार आता है।।

वो नीम ओ बरगद की छाँव,गुड़गुड़ाते हुक्कों की तांव,
वो अखाड़े में पेलमपेल, वो कबड्डी का खेल,
पिता की डाँट,माँ का वात्सल्य,दादा-दादी का दुलार नजर आता है,
मेरे गाँव पर मुझे प्यार आता है,
बचपन की यादों का,ज्यों ज्यों ज्वार आता है,
मेरे गाँव पर मुझे प्यार आता है।।

जीवन का द्वन्द्ध है, धन की मारामारी,
शहरीकरण की सम्पन्नता में एकाकी बीमारी,
शाम की लालिमा आते, चौपाल पर यार नजर आता है।
बचपन की यादों का,ज्यों ज्यों ज्वार आता है,
मेरे गाँव पर मुझे प्यार आता है।।

रविवार, 23 अप्रैल 2017

तीन तलाक दिनाँक २४ अप्रैल २०१७

तीन तलाक

जिन्दगी गमों का सागर हो गयी,
जबसे तुमने दिल से निकाला,
खुशियाँ जिन्दगी की काफ़ूर हो गयी।।

ये विरासत थी हस्तियाँ बनाने की,
अरमानों के सपने सजाने की,
वो हँसी रात की अश्रुयों में विलीन हो गयी।।

जिन आँखों ने वात्सल्य निहारा था,
हुयी अकेली सायें की परछाई बिन जब से,
आज उनकी आत्मा क्षीण हो गयी।।

गिरी जो गाज बेटी की अस्मत पर नैन पथरीले भये,
जिन्दगी दुश्वार हो गयी तेरे तीन शब्दों से,
अप्सरा थी उस रात जो अब कैसे मलीन हो गयी।।

ये कैसा धर्म है कैसी शरीयत का कैसा कानून,
जो जुल्म की देता इजाजत आत्मा का करता खून,
ऐ वासना के रहनुमाओं क्यों बुद्धि मलीन हो गयी।।

मंगलवार, 8 नवंबर 2016

मोदी जी द्वारा 500 व 1000 के पुराने नोट के संदर्भ में दिनाँक ०९ नवम्बर २०१६

मोदी ने काले धन की माँद में डाले डाके है,
रखी तिजोरी जहाँ अंधियारे झोपड़ियों में उजाले है,
काला धन बेकार किया मेहनत का कश साकार किया,
जो मतलब वाले थे पैसे के अब घिरे है पैसे से,
दिया रूपया ना लिया रूपया बस स्वरूप बदल दिया,
एक निर्णय निर्भीक लेकर अर्थ जगत का इतिहास बदल दिया,
इतना व्रद्ध निर्णय लिया थोड़ा सा और सोचा होता,
दो नोटों के साथ साथ काश सारे नोट बदले होता,
होता जो निर्णय ऐसा परिवर्तन अलग दिखाई देता,
काला धन का पाई पाई अंदर से बाहर आता दिखाई देता,
हर जमा खोर परेशां होता ओर असल कर बाजारों में,
मोदी तेरा डंका ओर जोर से बजता ईमान के गलियारों में।।

सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

पंक्तिया

रीत पुरानी प्रीत नयी लाया हूँ,
प्रेम के परिवेश का दीप जलाने आया हूँ,

मै समझा हूँ तुम्हे समझाने आया हूँ,
राजनीति के पुरोधों से तुम्हे जगाने आया हूँ,

भाई से भाई लड़ाने ये धर्म परिभाषा गढ़ते है,
मतलब खातिर अपने ये विद्वेष भाषा पढ़ते है,

मानवता के हत्यारे मानव को देते है सन्देश,
रंग एक है खून का खून में है करते विभेद,