गुरुवार, 8 अगस्त 2024

आज के वैश्विक प्रदृश्य के दृष्टिगत जिसमें विनेश फोगाट को ऑलंपिक से बाहर होना तथा शेख हसीना का भारत शरण पर दिनाँक ०८ अगस्त २०२४

फ़ितरत नहीं बदलता दगाबाज कभी,
चाहे कितना भी पाबंद हो निगाहों में,

मौका मिलते ही डसता जरूर है,
पाला हो जब साँप अपनी ही बाहों में,

हैं लोभी जो किसी भी हनक का,
धोखा देगा वक्त पर लोभ की सनक में,

संभलकर रहना राजगीरों से,
विष बाँट देगा पता न होगा सपनों में,

दुश्मनी पाली हैं सियासतदाँ से,
हर शख़्स को रखना निगाहों में,

हज़म न होगा उसे तेरा अम्बर छू जाना,
जिसे महात्मा समझा हैं विचारों में ।।

पुष्पेन्द्र सिँह मलिक "नादान"

रविवार, 10 मार्च 2024

माॅं की याद– दिनाँक १० मार्च २०२४

मैं एक छोटा सा बच्चा था,
तेरी ऊंगली थाम के चलता था,
तू अगर दूर नज़र से होती थी,
तो मैं आँसू आँसूरोता था...!!

एक ख़्वाब का रोशन बस्ता,
तू रोज़ मुझे पहनाती थी,
जब डरता था मैं रातों में,
तू अपने साथ सुलाती थी...!!

माॅं तूने कितने वर्षों तक,
इस फूल को सीॅंचा हाथों से,
जीवन के गहरे भेदों को,
मैं समझा तेरी बातों से...!!

मैं तेरे हाथ के तकिये पर,
अब भी रात को सोता हूॅं,
माॅं मैं एक "नादान" सा बच्चा,
अब भी तेरी याद में रोता हूॅं...!!

मंगलवार, 13 फ़रवरी 2024

राष्ट्रीय महिला दिवस १३ फ़रवरी २०२४

हो नारी तुम, कभी किसी के रोके नहीं रूकती हो,
हे नारी तुम खुद से सभी के दिलों में एक पहचान बनाती हो।।

माँ, बहन और पत्नी हर रूप में ढल जाती हो,
हे नारी तुम हर किरदार बखूबी निभाती हो,
घर हो या बाहर कर्तव्य पथ पर हर जगह साथ निभाती हो,
हे नारी तुम खुद से सभी के दिलों में एक पहचान बनाती हो।।

बनी अगर माॅं तो श्वास और प्राण देती हो,
बनी जो बहन अगर तो आदर और मान देती हो,
बन गयी अगर भार्या तो प्यार और सम्मान भरपूर देती हो,
हे नारी तुम खुद से सभी के दिलों में एक पहचान बनाती हो।।

उड़ने को आकाश में हौंसलों के पंख फैलाती हो,
चाह लेती हो जो वो हमेशा करके ही दिखा देती हो,
हालातों से लड़कर सपनों को साकार बना देती हों,
हे नारी तुम खुद से सभी के दिलों में एक पहचान बनाती हो।।

शुक्रवार, 26 जनवरी 2024

अंग्रेज़ी नव वर्ष क्यों मनायें? दिनाँक २६ जनवरी २०२४

कॉपी/पेस्ट कविता कुटुम्ब एप से

_*🙏अपना नववर्ष मनाएंगे🙏*_

*हवा लगी पश्चिम की*
*सारे कुप्पा बनकर फूल गए ।*

*ईस्वी सन तो याद रहा ,*
*पर अपना संवत्सर भूल गए ।।*

*चारों तरफ नए साल का ,*
*ऐसा  मचा है हो-हल्ला ।*

*बेगानी शादी में नाचे ,*
*जैसे कोई दीवाना अब्दुल्ला ।।*

*धरती ठिठुर रही सर्दी से ,*
*घना कुहासा छाया है ।*

*कैसा ये नववर्ष है ,* 
*जिससे सूरज भी शरमाया है ।।*

*सूनी है पेड़ों की डालें ,* 
*फूल नहीं हैं उपवन में ।*

*पर्वत ढके बर्फ से सारे ,* 
*रंग कहां है जीवन में ।।*
👇👇
*बाट जोह रही सारी प्रकृति ,* 
*आतुरता से फागुन का ।*

*जैसे रस्ता देख रही हो ,* 
*सजनी अपने साजन का ।।*

*अभी ना उल्लासित हो इतने ,* 
*आई अभी बहार नहीं ।*

*हम अपना नववर्ष मनाएंगे ,* 
*न्यू ईयर हमें स्वीकार नहीं ।।*

*लिए बहारें आँचल में ,*
*जब चैत्र प्रतिपदा आएगी ।*

*फूलों का श्रृंगार करके ,* 
*धरती दुल्हन बन जाएगी ।।*

*मौसम बड़ा सुहाना होगा ,*
*दिल सबके खिल जाएँगे ।*

*झूमेंगी फसलें खेतों में ,* 
*हम गीत खुशी के गाएँगे ।।*
🚩🚩👇👇🚩🚩
*उठो खुद को पहचानो ,* 
*यूँ कबतक सोते रहोगे तुम ।*

*चिन्ह गुलामी के कंधों पर ,* 
*कबतक ढोते रहोगे तुम ।।*

*अपनी समृद्ध परंपराओं का ,* 
*आओ मिलकर मान बढ़ाएंगे ।*

*आर्यवृत के वासी हैं हम ,* 
*अब अपना नववर्ष मनाएंगे ।।*
        🙏🙏🙏🙏


सोमवार, 21 अगस्त 2023

नाग पँचमी दिनाँक २१ अगस्त २०२३

आज नाग पञ्चमी है,
चलो साथी वो बमी ढूँढते है, 
जहाँ विषधर रहते हैं,
वो जगह कहाँ नहीं,
जहाँ विषधर नहीं मिलते,
अपने आस पास देखों और ढूंढों
पहचानों उन नागों को,
जो डसते है अपनी सोच से,
जो नहीं चलते कभी भी सीधी राह,
जरूरी नहीं वह सरीसृप प्रजाति से हों,
वह हर प्राणधारी में हो सकते हैं,
जो आपको काट लेते है अपनी हवस के लिये,
अपनी खीज से चिढ़–चिढ़े अपनी संतुष्टि के लिये,
जो नहीं मिलती उन्हें फिर भी, 
गर्वित महसूस करते है वो स्वयं को,
खुद में खुद दूसरों को डसकर,
विचार रूपी मंथन से मथकर,
भुजंग में इतना दम कहाँ,
जो एक बार में बहुतों को विषाक्त कर दे,
ये नाग सोच रूप से डसते हैं,
आपके अपने, आपके आस–पास ही तो बसते हैं,
इनको पूजना जरूरी तो नहीं लेकिन,
आज के समय में मज़बूरी जरूर है,
ये वो नाग हैं जो आपकी प्रगति पर
कुण्डली मारकर बैठ जाते हैं,
और जब तक नहीं उठते जब तक,
उनको आत्म संतुष्टी न हो जाये,
अथवा उठा न दिये जाये,
दोनों ही रूप में यह स्वास्थ्य व समय
के लिये अच्छे नहीं है,
अच्छा तो यही हैं कि नागों को, 
हाथ जोड़कर अथवा चढ़ावा चढ़ाकर (पूजा अर्चन कर) वहाँ से निकल लो,
इस प्रकार नाग पंचमी का पर्व मना लो।।

स्वरचित :– पुष्पेन्द्र सिँह मलिक "नादान"

बुधवार, 28 जून 2023

समझ आदमी के लिये दिनाँक २९ जून २०२३

इस चराचर जगत में प्रभु ने क्या–क्या ना बनाया,
जीव बनायें बहुत से एक जीव उसने आदमी सजाया,
बनाकर पेड़–पौधे जीव–जन्तु, कीड़े और मकोड़े,
समझाया उसने आदमी को विवेक जगाया ना कर्म कर खोड़े,
सृष्टि के क्रम वास्ते मोहमाया सजाकर प्यार की दी भूति,
फिर भी नासमझ रहे बने मतलबी, इंसान बने थोड़े,
ज्ञान दिया विज्ञान दिया चर–चराचर को सजाने हेतु,
मानव तूने लिया रोग लगा सब कुछ हथियाने हेतु,
संग्रह कर तूने दे दी चुनौती उस परम पिता परवरदिगार को,
मानव होकर ही बाँट दिया मानव को कुलषित कर विचार को,
मत मथकर तूने रच डाले ग्रन्थ मनभरकर अभिमान को,
ये तेरा है ये मेरा है कह बाँट दिया अल्लाह और भगवान को,
सब जीव प्यार करें नित्य नियम कर दिनचर्या से,
आदमी तू ही बस राज सजाता मध्य रख खुद के किरदार को,
भूल गया तू उसको जिसने रचा ये सारा जहान   रे,
कर्म कर चाहे जैसे फल है आधार ये समझ अब भी "नादान" रे,
सुधार गति क्यों मारे मति ना रहा न रहेगा कोई सदा इस जहान में,
जैसे कर्म करेगा बन्दे वैसे फल देगा भगवान रे।।

पिता दिनाँक १८ जून २०२३

वहीं ज़मीं मेरी वहीं मेरा आसमान है, 

वहीं है खुदा मेरा वहीं मेरा भगवान है।।

नींद अपनी भुला के सुलाया हमको,

आँसू अपने सुखा के हँसाया हमको,

देकर सर्वस्व जिसने भुलाया स्वयं को, 

पिता ही तो हैं जिसने हर ख़ुशी से मिलाया हमको,

पिता के बिना जिन्दगी विरान है,

सफ़र तन्हा और राह सुनसान है,

वहीं था जमीं मेरी वहीं आसमां है,

वहीं है खुदा मेरा वहीं मेरा भगवान है।।


रविवार, 18 जून 2023

आज की हकीकत (कड़वा सच) दिनाँक १० मई २०२३

सच्चाई की नज़र से ज़मींनीं हकीकत को देखा तो सितारा दूर नज़र आया,
ज़मींनीं बात को खुदी (स्वार्थ) के आईने से देखा तो मंजर जो दिखाया नज़र आया,
थी बात बस इतनी सी अहम के वजूद से जो मेरा न था मेरा नज़र आया,
ज़मींनीं बात को खुदी को दूर कर दुनियाँवी नज़र से देखा तो जमीं में मिला पाया।।

छल,बल के साथ जो चला मंज़िल–ए–मुक़ाम  पाने को वो सफ़ेद पॉश नज़र आया,
चाहत थी शिखर छूने की जिसकी वो शिखर पर चढ़ता ही नज़र आया,
सत्यमेव जयते मंत्र के साथ जो चलता रहा भरी धूप में मंजर धुंधला नज़र आया,
राजनीति के परिवेश में सच को कभी जीतता तो कभी हारता नज़र पाया।।

खत्म थी सांसे जिनकी मुर्दा थे शमशान में  बहुत सी ज़िंदा लाशों को चलता पाया,
ज़मीर की बात मत कर "नादान" वास्ते मतलब बहुतों का गिरता नज़र आया,
अहम के वहम से भरी दुनियाँ में मैं ही मैं बाक़ी थी बाकि ख़्वाब नज़र आया,
झूठ बिकता रहा सरे बाज़ार सच्चाई के आईने को काला नज़र पाया ।।

शनिवार, 3 जून 2023

इन्सान और आदमी दिनाँक ०३ जून २०२३

खुशियाँ कम हैं, अरमान बहुत हैं,
जिसे भी देखों परेशान बहुत है ।।

निकट से देखा तो निकला रेत का घर,
किन्तु दूर से इसकी शान बहुत है ।।

कहते हैं सत्य का कोई मुक़ाबला नहीं,
किन्तु आज झूठ की पहचान बहुत है ।।

मुश्किल से मिलता है शहर में आदमी,
लेकिन यूँ कहने को इन्सान बहुत हैं ।।

बुधवार, 10 मई 2023

आज की हक़ीक़त (कड़वा सच) दिनाँक १० मई २०२३

सच्चाई की नज़र से ज़मींनीं हकीकत को देखा तो सितारा दूर नज़र आया,
ज़मींनीं बात को खुदी (स्वार्थ) के आईने से देखा तो मंजर दिखाया नज़र आया,
थी बात बस इतनी सी अहम के वजूद से जो मेरा न था मेरा नज़र आया,
ज़मींनीं बात को खुदी को दूर कर दुनियाँवी नज़र से देखा तो जमीं में मिला पाया।।

छल,बल के साथ जो चला मंज़िल–ए–मुक़ाम  पाने को वो सफ़ेद पॉश नज़र आया,
चाहत थी शिखर छूने की जिसकी वो शिखर पर चढ़ता ही नज़र आया,
सत्यमेव जयते मंत्र के साथ जो चलता रहा भरी धूप में मंजर धुंधला नज़र आया,
राजनीति के परिवेश में सच को कभी जीतता तो कभी हारता नज़र पाया।।

खत्म थी सांसे जिनकी मुर्दा थे शमशान में  बहुत सी ज़िंदा लाशों को चलता पाया,
ज़मीर की बात मत कर "नादान" वास्ते मतलब बहुतों का गिरता नज़र आया,
अहम के वहम से भरी दुनियाँ में मैं ही मैं बाक़ी थी बाकि ख़्वाब नज़र आया,
झूठ बिकता रहा सरे बाज़ार सच्चाई के आईने को काला नज़र पाया ।।

मंगलवार, 25 अप्रैल 2023

किसी के प्यार में दिनाँक १९ जुलाई २०१७

हम तो बताते रहे, वो समझे कहाँ हमारी बात,
वो समझदार थे ज्यादा, हम बेकार जज्बाती थे यार।।

उल्फत में भी उनको सीने में समाये रखा,
प्यार की बाते उनसे यूँ ही कह ना पाये यार।।

जबसे उनसे बात हुई वो अपने से ज्यादा अपने लगने लगे,
मुलाकात का वक्त मुक़र्रर न हुआ वो मुलाकातों में आने लगे यार।।

यूँ हर दम वो साथ है मेरे पर परछाई नजर नही आती,
वो रात बहुत हसीन हुई, जब से सपनों में वो आने लगे यार।।

सोमवार, 24 अप्रैल 2023

चाहत गीत – प्रेमी की चाहत में दिनाँक २२ अप्रैल २०२१

उसके बिन चुप चुप रहना अच्छा लगता है,
खामोशी से एक दर्द को सहना अच्छा लगता है।।

जिस हस्ती की याद में आँसू बरसते हैं,
सामने उसके कुछ ना कहना अच्छा लगता है।।

मिलकर उससे बिछड़ ना जायें डरते रहते हैं, 
इसलिये बस दूर ही रहना अच्छा लगता है।।

जी चाहे सारी खुशियाँ लाकर उसको दे दूँ,
उसके प्यार में सब कुछ खोना अच्छा लगता है।।

उसका मिलना ना मिलना किस्मत की बात है,
पल पल उसकी याद में खोना अच्छा लगता है।।

शनिवार, 18 मार्च 2023

सफ़र एक आईने से दिनॉक १९ मार्च २०२३

सफ़र को तुम भी खड़े थे, हम भी खड़े थे,
दोनों ही चलने को तैयार खड़े थे ।।

सफ़र दोनों का था एक ही जैसा,
दोनों के रास्ते कांटों भरे थे ।।

राहें सफ़र आसान न था दोनों के लिये,
हम प्यार संग चले तुम मतलब साथ चले थे।।

चुनी राह दोनों ने आगे बढ़ने की खातिर,
तुम ही क्यों ? निकले आगे, हम वहीं खड़े थे ।।

निकले जो आगे ध्यान उन्हीं पर था हमारा,
सशक्त हम ज्यादा थे, पर विभीषण तेरे संग चल पड़े थे ।।

देखा जो झाँककर अपने सफ़र को आईने में,
कुछ अपने ही थे जो टांग को खींचे पड़े थे ।।

जिन्दगी की दौड़ से हर बार पाया हमनें ये सबक,
"नादान" थे बड़े संजीदा,तुम मतलबी बड़े थे ।।

शुक्रवार, 17 मार्च 2023

जिन्दगी एक नजर में दिनॉक १७ मार्च २०२३

कभी इधर गया कभी उधर गया,
जिधर भी गया खराब थे उधर के रास्ते ।।

ढेर था विचारों का, हृदय उमंग भरा था,
न कह सका न सुन सका, मन भरा भरा था।।

शिकवा करता क्या किसी से सभी अपने थे,
बैठा जब भी खाली मन सुलझाने मन के फासले।।

कोशिश बेकार गयी हर बार, मुकम्मल करने की,
संजीदा जब भी हुआ, सुधार के वास्ते।।

चल रही है गाड़ी, ठहर सी गई है जिन्दगी,
चलाने हुनर जब भी निकला, घर के वास्ते।।

गिरा उठा, उठा गिरा, जीने के लिये कई बार मरा,
खड़ा ही पड़ा,हर बार मरा जिन्दगी के वास्ते ।।


सोमवार, 12 सितंबर 2022

मानव सेवा हेतु दिनांक १० सितम्बर २०२२

मैंने भी जलाई है ज्योति,

तुम रस बिखराओ तो सही,

इश्क़ भले अधूरा रह जाये,

प्यार होगा पूरा समर्पण का प्रण

निभाओ तो सही ।।


राह देखती है निगाहें गाहे–बघाये,

नज़र में आओ तो भान हो दिखे झलक ही सही

गलत सही का भेद समय बताता है,

जज़्बात सलामत कर कदम बढ़ाओ तो सही ।।


कर्म की गति बड़ी न्यारी है बड़ी प्यारी,

होगा प्रकाश जरूर दिया जलाओ तो सही,

पाप–पुण्य सब यही हैं पता चलेगा,

जीवन के दर्शन में एक बार नहाओ तो सही ।।


जीव तो जीव है प्यार करो अपनी जगह,

सदैव मंत्र रहा हमारा अतिथि देवो: भाव:,

भूल को भूलकर आत्मा को गुरुत्व कर,

बाल को पालकर मानव बनाओ तो सही ।।

रविवार, 12 जून 2022

नर और नारी जड़ चेतन दिनाँक १२ जून २०२२

बीज जगत में, 
एक नर बना एक नार,
नर नार बन जड़ चेतन,
नर जड़ बना वो पौधा,
प्रकृति से मिला जो दिया उसे,
खूब फूला फला वो जड़ के कारण,
नर सर्वस्व वारता रहा वो अपने को निखारता रहा,
नर जड़ ही रहा वो पत्ता तना फूल फल बन गया,
नर जड़ बन निष्ठुर सा तना रहा वो जग की ममता पार गया,
उपमाओं के खेल से लेकर सभी की भावनाओं तक सब मिला उसे,
नर जड़ था मूक देखता रहा अपने कर्म व भाग्य को वो अपने भाग्य पर नाज गया,
नर के कर्म से उत्पन्न रस को तरह तरह से भोगता रहा ओर नर बस मूक सोचता रहा,
यह नर था जो जड़ता रहा प्रत्येक परिस्थिति में और नार खिलता रहा ।।

शुक्रवार, 11 मार्च 2022

चोर खुद ही मचाता शोर दिनाँक १२ मार्च २०२२

चोर को सभी ओर,
नजर आते है चोर ही चोर,
चोर चोर चोर, 
चोर ही खुद मचाता शोर।। 

भीड़तंत्र में कुछ भो बोलो,
न कोई मतलब बस मुँह खोलो,
ऐ "नादान" जानता है, 
तंत्र में प्रजा है परेशां,
बस रख दुखती नश पर हाथ,
चारों ओर उलझाकर,
लोगों को बहकाकर,
मतलब सीधा करना है,
जो मरे सो मरे,
सीधा अपना उल्लू करना है,
जब तक न हो उल्लू सीधा,
तब तक करना शोर,
हो जाये जो उल्लू सीधा,
तब भी करना शोर,
कुछ का कुछ दिखाना है,
स्वप्न हसीन सजाना है,
स्वप्न तो स्वप्न है उनके लिये,
जो तेरे संग मचाते शोर,
जो तू बोले ज्यों मुँह खोले,
बिना सोचे संग संग बोले,
हरदम करते शोर,
ये तो नादान बहुत है,
स्वप्न से दिल पर चोट खाने तक,
अपना उल्लू सीधा हो जाने तक,
शोर मचाकर माल पाने तक,
आज नही तो कल के आसन तक,
बस करना है यही शोर,
चोर चोर चोर, 
चोर खुद भी मचाता शोर,
तुम भी मचाओ शोर,
चोर चोर चोर 
चोर खुद ही मचाता शोर ।।

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2022

शर्म, दिनाँक २३ फरवरी २०२२

न देखिये आस-पास कुफ़्र न देखकर विनाश कीजिये,
उठा जो आचरण दिया ओर उठाकर विकास कीजिये।।
बड़ी मेहनत की थी सदियों की एहसास-ए-इज्ज़त सजाने में,
बनाकर जगह थेकली की, लगाकर न फिर नुमाइश कीजिये ।।
गिरकर न नज़रों से खत्म करो, अदब के खजाने को,
बन्दगी न करो न सही, शर्म है गहना तो शर्म कीजिये ।।

खानदान की कीमत पता चलती है हुस्न-ए-सलूक से,

अदब का हर पहलू इससे है, नजरों में थोड़ी हया कीजिये ।।

मिलती नही मन्जिल में बा-वफ़ा अब हर मुसाफ़िर से,
आजकल गुरबत में है "नादान" जरा ईनायत कीजिये ।।

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2022

सरस्वती आराधना - बसन्त पञ्चमी दिनाँक ०५ फ़रवरी २०२२

वर दे माँ वीणा वादिनी वर दे माँ सरस्वती,
हे कमलधारिणी वर दायिनी वर दे माँ सरस्वती,
तुझे पूजूँ माँ तुझे ध्याऊँ पल-पल,क्षण-क्षण तुझे रिझाऊँ,
वर दे माँ वीणा वादिनी वर दे माँ सरस्वती,
हे कमलधारिणी वर दायिनी वर दे माँ सरस्वती।।

प्रकृति सम श्रंगार कर वाणी का, हर मन में बस जाऊँ,
ज्ञान की ज्योति ऐसे जले, भवसागर तर जाऊँ,
तेरी कृपा की भिक्षा चाहूँ हे वीणा वादिनी माँ सरस्वती ।।

कदम-कदम ज्यों बढूँ सत्य मार्ग पर चलता जाऊँ,
निर्भय का वर दे वर दायिनी अभय हो विजय पाऊँ,
मन बसे कल्याण भावना ऐसा वर दे कमलधारिणी कल्याणी ।।
इन्द्रिय खुले तन-मन की समभाव सजे मेरे मन-मन्दिर में,
राग-द्वेष से कोसों दूर हो,वैरी भी अलंकृत हो जीवन में,
भारत सिरमौर बनें विश्वभर में,मैं बस जाऊँ जन-मन में ऐसा वर दे माँ सरस्वती ।।

वर्तमान इंसान दिनाँक ०४ फरवरी २०२२

शख्सियतों ने किरदार के कई रंग, चेहरे पर चढ़ा रखे हैं,

खिलाड़ी हैं जो मंजे हुये, बदलने को पाला मैदान बचा रखे हैं ।।


दोगली फ़ितरत में, अहम के किरदार सज़ा कर,

कभी तेरे कभी मेरे बन, बीच फ़ासले बना रखे हैं ।।


कब कौन धोखा दे जाये, ये कौन जानता हैं,

लेकिन धोखा वहीं देते है, जो तूने अपने बना रखे हैं ।।


प्यारी आँखों की हया कैसे मरी, जो खोजने चलों,

बेशर्म किरदार कि परछाई के पीछे भी किरदार नज़र आते हैं ।।


द्वंद्व है धुंध है अहम की, हाथ को हाथ दिखता नहीं,

दीप जलाकर देखना, पीठ मुखौटे के चेहरे नज़र आते हैं ।।


मुकम्मल है "नादान" बहुत सीधा है भोला-भाला है,

मतलब के लिये लोग, जब-तब नीच घर पानी भर आते हैं ।।