कोख मारकर कन्या जिमायें,
रख कोख की आस,
गोद को बिसरायें,
होते हैं आज भी सीता हरण,
कैसे राम जन्म मनाऊँ ।।
राम पूजते गली गली,
घर घर रावण बैठे,
इंसानी वेश धर कर्म
गर्त का करतें जाते,
फिर भी राम भक्त कहलाते,
कैसे पहचान कराऊँ।।
मानव मर्यादा जो धरते,
जो बात मर्म की करते,
बिसरा कर कौशल्या,
सूपर्णखा को वरते
दशरथ भेजें आश्रम द्वार,
कैसे पूजन कर पाऊँ ।।
धन, बल, यश के लिये,
छल कपट दम्भ से जो जिये,
निति बुरी से नीति जो धरे,,
मान-मर्यादा त्यागकर लखन को सताये,
वही आज राम वेश धरे,
कैसे रामनवमी पर्व मनाऊँ ।।
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