दीप जलाते माटी के,मन के दीप जलाओं,
तम् दूर करो मन के,सबको गले लगाओ।
फैला है अन्धकार द्वेष-भाव का,
दिन चार कदम से क्या होगा,
मंजिल लम्बी समय लघु,
बन प्रकाश पुंज,ज्ञान दीप जलाओं,
दीप जलाते माटी के,मन के दीप जलाओं,
तम् दूर करो मन के,सबको गले लगाओ।।१।।
भटके हुये है विषयों में,
अन्ध अमावस में खोये हुये,
रात अलौकिक करने को पूर्णिमा कि भाँति,
दीपक बन दीपक जलाओं,
दीप जलाते माटी के,मन के दीप जलाओं,
तम् दूर करो मन के,सबको गले लगाओ।।२।।
सुलग रहीं है जो अग्नि मन के भीतर,
बन आतिशी विस्फोट,
इस दिवाली हो शपथ बन शांति दूत,
नया सवेरा अपनाओं,
दीप जलाते माटी के,मन के दीप जलाओं,
तम् दूर करो मन के,सबको गले लगाओ।।३।।
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