मंगलवार, 20 जुलाई 2021

साथ निभाओ तो कोई बात बने दिनाँक १५ जून २०१३

मीत का साथ निभाओ तो कोई बात बने।
गीत में साज बजाओ तो कोई बात बने।।
एक दिन मौज मनाने से क्या भला होगा?
रोज दीवाली मनाओ तो कोई बात बने।
इन बनावट के उसूलों में धरा ही क्या है?
प्रीत हर दिल में जगाओ तो कोई बात बने।
क्यों खुदा कैद किया दैर-ओ-हरम में नादां,
रब को सीने में सजाओ तो कोई बात बने।
सिर्फ पुतलों के जलाने से फायदा क्या है?
दिल के रावण को जलाओ तो कोई बात बने।
रूप की धूप रहेगी न सलामत नादां,
इश्क का ध्यान लगाओ तो कोई बात बने ।।

शनिवार, 5 जून 2021

वक्त बतायें कौन अपना दिनाँक ०३ जून २०२१

कोई समझकर ना समझ सा बन जाता है,
कोई नासमझ को हलकान कर जाता है,
ये जो दुनिया है दुनिया बडी जालिम है,
कोई बनकर दोस्त घात कर जाता है,
मिलते है कई अपने शिक्षक गर्दिशें दौर में,
लगाकर मरहम बातों का शूल में शूल कर जाता है,
जब आती है किस्मत बनकर अपने सब  पर,
अपना जो सपना था वही बनकर मूल आता है,
वक्त बता देता है भेद अपने अपने का,
गर्दिशे दौर में जो गैर काम कर जाता है।।
                                   

विश्व पर्यावरण दिवस ०५ जून २०२१

कहाँ थे कहाँ से कहाँ आ गये अभी,
स्वर्ग सरीखे थे हम विश्व के सिरमौर थे,
काटकर जीवन की डोर बँधी थी जहाँ,
विकास के नव आयाम ऐसे रचे वहाँ,
तंग हुये जब भंग किये प्रकृति के रूप,
साँसों तक मोहताज हुये कर प्रकृति कुरूप,
मैं मेरा अर्थ समर्थ के फेर में मानव रहा बोराय,
जितना पढ़ा आगे बढ़ा उतना ही पगलाये,
छोड़ बुनियादी सीख को वृक्ष किये हलकान,
सन्तुलन है जिससे जंगल हो घमासान,
बचे नहीं जल जंगल जो होगा सृष्टि का नाश,
जन-जन हर मन यह प्रण धर वृक्ष रखेंगे आस-पास,
वृक्ष रखेंगें आस-पास होगा पर्यावरण संरक्षण,
सुथरी धरती-साफ गगन जिससे होगा निर्मल तन-मन,
हूँ भले ही "नादान" पर लीजो इतना कहना मान,
निर्मल तन-मन से सुखद जीवन तज से राष्ट्र बनता महान ।।
                       "नादान"




मंगलवार, 18 मई 2021

महामारी से भाव दिनाँक १९ मई २०२१ दिन बुधवार

दिल के झरोके से थोड़ी सी आवारगी झलकने ही लगी थी,
जिंदगी कुछ कुछ मस्त बयार सी चलने ही लगी थी, 
कुछ कदम बढ़े ही थे कि कुदरत का नजराना ऐसा मिलने लगा,
कमबख्त हर दिल की धड़कन भय में बदलने लगी,
वैसे तो हम रोगी हो ही चुके थे मनोविज्ञान से,
कमबख्त उम्र के रोग से सबल होगा इलाज अज्ञान थे,
सोचा जब हमने उमीदों को अब नजराना मिलेंगा,
बेहतर होगा कल कल से नव आयाम मिलेगा,
बेबसी सफ़र करने लगी बेबस लोग ओर लाशों को देखकर,
लाश भी पूछती है लाश से कब होगा उद्धार दशा देखकर,
गङ्गा जी भी उद्वेलित है आज मुक्ति का यह हश्र देखकर,
हे जटाधारी अब दयाकर रहा नही जाता अब भागीरथी की दशा देखकर ।।

आपका परम् स्नेह आकांक्षी :- पुष्पेन्द्र सिँह मलिक " नादान"

शनिवार, 27 मार्च 2021

होली दहन पर्व २८मार्च २०२१

मौसम जब मुस्कराने लगे,
कोयल गीत गाने लगे,
बसन्त बीच बहार कहकहाने लगे,
भवँर देख कली-कली गुनगुनाने लगे,
फूल भी रँग तरह-तरह के बरसाने लगे,
दिल कहने लगा चलो होली मनायें चलो होली मनायें ।।
महीना फाल्गुन का जब आने लगे,
दिल बन राग फ़ाग गाने लगे,
यौवन की हस्ती जब मस्ती दिखाने लगे,
अंग अंग में चढ़ भंग रँग दिखाने लगे,
टेसू रँग केसरिया छाने लगे,
दिल कहने लगा चलो होली मनायें चलो होली मनायें ।।
राग-द्वेष जब हवन सजाने लगे,
जलकर मैं मन पपीहा बन जाने लगे,
प्रीत की डोर मन के उस छोर जब जाने लगे,
हर जन मन रास रचाने लगे,
तजकर भूल छोड़ शूल संग संग एक रँग हो जाने चले, 
रूठकर जो बैठे है उनको मनाने चले,
दिल से दिल मिला अंग अंग संग रँग लगाने चले,
दिल कहने लगा चलो होली मनायें चलो होली मनायें ।।
                "नादान"

शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

नववर्ष तुमने कहा और हमने मान लिया दिनाँक ०१ जनवरी २०२१ दिन शुक्रवार

तुमने कहा और हमने मान लिया,
नववर्ष में हैं अभी दिन शेष,
लेकिन हमने संज्ञान लिया,
तुमने कहा और हमने मान लिया।।
न प्रकृति ने रंग दिखलाया,
न धरा ने यौवन सजाया,
सर्द हवा देती है दर्द घना,
बर्फ ऊपर कुहासा है पड़ा,
न दे कुछ दिखायी, 
लेकिन तुमने जब नव राह सुझायी,
तब हमने संज्ञान लिया ।।
युगों युगान्तर से रीत है भावी,
भोर की किरण निकलते दिन है हावी,
रात निशाचरी में दिनमान है बदले,
कैसे कहे वर्षमान है बदले,
फिर भी रीत नयी तुमने है बतलायी,
तुमने जब नव राह सुझायी,
तब हमने संज्ञान लिया ।।
न नव अंकुर फूटे, 
न नव कलरव गीत सुनाये,
न प्रकृति दुल्हन बन सजी,
न स्नेह की सुधा ले आये,
न फाल्गुन की मस्ती तने,
न चैत्र की प्रतिपदा है आये,
फिर क्यों कर मन नव वर्ष मनायें,
पर तुम मना रहे और हमे भी समझाये,
यह रीत तुमने ही बतलायी,
तुमने जब नव राह सुझायी,
तब हमने संज्ञान लिया ।। 
तुमने कहा हमने लिया संज्ञान,
तुम भी लो मान अब,
हम भी देते है कुछ प्रमाण,
इतिहास के झरोखे बतलाते है,
नववर्ष के प्रथम दिवस को याद कराते है,
प्रकृति के एकदिवसीय क्रम को समझाते है,
ब्रह्मा जी के निर्माण दिवस को,
भूल रहे जो ऋषी दयानन्द रचित,
आर्यो के पुनःनिर्माण दिवस को,
आदिकाल के गुणन दिवस को,
हम रामराज्य के अभिषेक दिवस को,
शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को,
विक्रमादित्य ने अलंकृत किया जो,
विक्रम सम्वत डाल दिया जो
बतलाते है विक्रमादित्य के विजय दिवस को,
भारतवर्ष के विश्व विजय दिवस पर्व को,
हम नव वर्ष दिवस कह मनाते है,
नववर्ष में हैं अभी दिन शेष,
लेकिन हमने संज्ञान लिया,
तुमने कहा और हमने मान लिया।।
अभी ओर थोड़ी दूर चलो,
आर्य और सनातनी संस्कृति को पूर चलो,
दिया जो प्रकृति ने सहेज उसे भरपूर चलो,
जिस दिन लिया सत्पुरुषों ने जन्म,
उस दिन मना खुशियाँ भरपूर चलो,
सन्त झूलेलाल हुये, उतर जग प्रसिद्धि छुये,
मान बढाते गद्दी का गुरु अङ्गद देव हुये,
डॉ हेडगेवार भी जिसदिन धरती छुये,
वीर गोकुला जी दे शहादत मोक्ष गति को प्राप्त हुये,
दिन उसी तिथि को सूर्य चन्द्र नक्षत्र छुये,
प्रकृति के एकदिवसीय क्रम को,
नववर्ष के प्रथम दिवस को,
दिवस के एक-एक क्रम को, 
वेद-पुराण समझाते है,
तब हमने संज्ञान लिया ।। 
जब तुमने कहा हमने लिया संज्ञान,
तुम भी लो मान अब,
हम भी देते है कुछ प्रमाण,
इतिहास के झरोखे बतलाते है,
नववर्ष के प्रथम दिवस को याद कराते है,
दिवस क्रम के हेर फेर में,
ईस्वी वर्ष के उस दिवस को,
जब दी शुभकामना मेल-मेल में,
तब हमने संज्ञान लिया, 
नववर्ष हमने भी मान तुम्हारा मान लिया।।
नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें ।।
                   "नादान"

मंगलवार, 29 दिसंबर 2020

आज के समय का वातावरण- व्यवहार इन्सान का दिनाँक २९ दिसम्बर २०२० दिन - मंगलवार

सच को सच कहना जैसे गुनाह हो गया,
देकर सर्वस्व जैसे सज़ावार हो गया,
कहा जिसने भी सच को बहुत दूर बहुत दूर...यारा बहुत बहुत मजबूर हो गया ।।

अदब का लिबास है उनकी बातों के शरीर पर,
हँसी है लपेटी कपट को शमशीर कर,
सत्य का पुरोधा खड़ा अकेला रह गया।।

करते बात पीठ पीछे जो बड़े होशियार हो गये,
लेकर चले जो झूठ का सहारा सामाजिक यार हो गये,
सच बोलकर "नादान" मगरूर हो गया ।।

छिछली चुनी चाहें राह, जीतकर वो तन गया,
आगे बढ़ जो चला पथ पुरोधा बन गया,
मतलब निकाल जो गया परवाना बन गया ।।

मतलबी फ़साने हल करने को,
तू भी पाला बदल लेता "नादान"
जो भी पीर बना वो बेगाना हो गया ।।