इस निरीह दुनिया मे कौन किसी का होता है,
चिता की वेदी पर दोस्त समय पूछ रहा होता है,
माटी को माटी में मिलने में,समय लगेगा कितना,
अग्नि में अग्नि मिल चलें,जितना जल्दी हो सके उतना,
वन भरा है वृक्षों से,तना लगा ना कुटिया में,
ये अपना है सपना है,जो छोड़ चला गया दुनियाँ से,
यहाँ भरम क्यों पाले है,लोग बड़े मत वाले है,
धर्म-कर्म कुछ ना समझे बस बहम को पाले है,
समय उसी का होता है,जो चल रहा अकेला होता है,
कलम उठाता नही कर से,लिख रहा इतिहास होता है,
उकेर कर सूत्र जीवन के नव मार्ग सजाता जा,
डगर कठिन होती है जितनी,निकट प्रभु उतना होता है,
"नादान" समझता है बुरा किया उसने ऐसा कर,
समझ कौन सका लीला उसकी,अतंतः शिक्षक की मार का फल अच्छा होता है।।
बुधवार, 8 नवंबर 2017
प्रभु बिन कौन किसी का दिनाँक ०८ नवम्बर २०१७
मंगलवार, 5 सितंबर 2017
०५ सितम्बर २०१७ शिक्षक दिवस
प्रतिदिन नमन मेरा प्रथम गुरूवर को,
नमन मेरा प्रतिदिन अंतिम गुरूवर को ।।
गुरू ज्ञान है गुरू मान है,
गुरूओं कारण ही पहचान है,
दिया न होता ज्ञान गुरू ने,
ज्ञान रहित होता अन्ध मेरा मन,
चक्षु रहित पशुवरत होता तन,
प्रतिदिन नमन मेरा प्रथम गुरूवर को,
नमन मेरा प्रतिदिन अंतिम गुरूवर को ।।
प्रथम वन्दन भोर से पहले,
आँख खुले तो मुझसे बोले,
उठकर बेटा पहले मुँह धोले,
माँ हरदम रहती चिन्तन में,
स्वर्ग बसा जिनके चरनन में,
प्रतिदिन नमन मेरा प्रथम गुरूवर को,
नमन मेरा प्रतिदिन अंतिम गुरूवर को ।।
साथ मे वन्दन उस पिता को,
जिसने भले बुरे का ज्ञान दिया,
न माना तो डाँट दिया और साथ दिया,
चिन्तन धर सुत का निज सुख त्याग किया,
नख-सिख तक ऋणी है उनको न कैसे ध्यान धरूँ ।।
प्रतिदिन नमन मेरा प्रथम गुरूवर को,
नमन मेरा प्रतिदिन अंतिम गुरूवर को ।।
दूजे चरण पखारूं उनके,
जिन्होंने अक्षर ज्ञान दिया,
समय बद्धता और अनुशासन ज्ञान दिया,
जीने का सामान दिया,
शिक्षक बन मुझमें स्व का भान किया,
प्रतिदिन नमन मेरा प्रथम गुरूवर को,
नमन मेरा प्रतिदिन अंतिम गुरूवर को ।।
वन्दन है मेरा फिर उन चन्दन को,
जिन्होंने रिश्तों का भान दिया,
बन लाड़ो-दाऊँ कभी चिढ़ाया कभी रिझाया,
मुझे खेल से जीवन खेल सिखाया,
भौजाई से ताई तक सबने कुछ व्यवहार दिया,
प्रतिदिन नमन मेरा प्रथम गुरूवर को,
नमन मेरा प्रतिदिन अंतिम गुरूवर को ।।
चलो नमन करूँ उन मित्रों को,
जो जीवन के हर क्रम में साथ रहे,
जिनसे कभी साद रहे और कभी वाद रहे,
सुख की बेला में जिनसे ही उल्ल्हास रहा,
दुख की घड़ी में घर के चिराग आबाद रहे,
प्रतिदिन नमन मेरा प्रथम गुरूवर को,
नमन मेरा प्रतिदिन अंतिम गुरूवर को ।।
अन्तिम वन्दन है अवसर को,
जो सबसे छूटा पूरा किया उस कसर को,
अवसर है ऐसा ज्ञान हो जाये पूरक जो,
भूले नही भूला जाता उम्र भर रहता संज्ञान,
अपना-पराया,भला-बुरा सब सिखा देता हैं वो,
प्रतिदिन नमन मेरा प्रथम गुरूवर को,
नमन मेरा प्रतिदिन अंतिम गुरूवर को ।।
हर जन कण है वन्दनीय वो जिनने,
जीवनक्रम में कुछ ज्ञान दिया,
हर दिवस है गुरदिवस,
जिसमें हमने भान किया,
वन्दन के चन्दन को क्यों दिन बँधाऊँ,
प्रतिदिन नमन मेरा प्रथम गुरूवर को,
नमन मेरा प्रतिदिन अंतिम गुरूवर को ।।
शिक्षक बन जिन्होंने उपकार किया,
जन्म दिवस है आज उनका मनाओं
डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन नाम जिनका,
नित्य स्मरण कर ऐसा कर्म कर,
तम दूर करो उनको वन्दन कर जाओ,
प्रतिदिन नमन मेरा प्रथम गुरूवर को,
नमन मेरा प्रतिदिन अंतिम गुरूवर को ।।
मंगलवार, 22 अगस्त 2017
मैं और प्यार दिनाँक २३ अगस्त २०१७
दिल में जिनकी तस्वीर सजी है,
सदियों से,
वो चेहरा नूरानी है,
हसरत थी जो कल,
वो आज भी बाकि है,
पा जाऊँ, सपनों के सौदागर को,
ये ख्यालात आज भी नव है,
बस दिल मे तस्वीर बसी है वो पुरानी है,
जीवन नित आगे क्रमबद्ध है,
जैसे सूर्यास्त के बाद उदय,
रात्रि के बात प्रभात का होना,
किन्तु तारीखे बदल जाती है,
हर नई सुबह की किरण के साथ,
मुजरिम हूँ यादों का,
जो आज भी जिन्दा हैं,
नव उतनी ही जितनी भौर की किरण,
क्यों साँझ की तरह उन्हें अँधेरे में नही पहुँचा पाया,
जज्बातों को अधरों पर ला न पाया,
शायद बहुत देर हो चुकी,
प्यार इसलिये आज कशमकश में है,
शायद दिल को झुठला पाता,
यादों को रात के अंधेरे में ले जाता
ताकि नया सवेरा किसी नये जज्बात का बीजारोपण कर सकें,
नव ख्यालात को जन्म दे सकें,
लेकिन ये हो न सका,
क्योंकि दिल मे जो बसा वो प्यार सच्चा था, है और शायद न मिट पायेगा, यथार्थ की तरह,
चूँकि ये मेरा प्यार है मेरी तरह ।।
रविवार, 20 अगस्त 2017
जब से देखा उसे दिनाँक २१ अगस्त २०१७
जब से देखा उनको, चाँद नजर आया है,
मन हिडोले खाने लगा प्यार नजर आया है ।।
देखकर तुझे मन हैरान है,
सूरत से सीरत का ख्वाब नजर आया है ।।
उसकी हँसी देखकर झूमने लगा,
शायद ख़ुशी का नया पैगाम आया है ।।
नैन भी बातें करने लगे है अब,
जब से काजल ने हाथ मिलाया है ।।
काजल ने नैनों से कहा इठलाते हुये,
होंठ चुप है,शायद बरसात का मौसम आया है ।।
चेहरे से नकाब जूँ ही उतारा उसने,
शरमा गया चाँद मेरा छुईमुई नजर आया है ।।
जब से बात करने लगे उनसे इजहार की,
गफ़लत सी होने लगी इन्तजार नजर आया है ।।
चाँद ने ली ओढ़ खामोशी की चादर,
चुप-चुप सा आफताब नजर आया है।।
गुरुवार, 17 अगस्त 2017
अन्जानों में अहम खोजना दिनाँक १८ अगस्त २०१७
अन्जानों के साये में अपनों को खोजता है,
बड़ा बावरा है वो जो इस कदर सोचता है ।।
कौन कहता है गिरते नही जाँबाज जंग-ए-मैदान में,
उसे क्या पता जो मैदान छोड़ स्थान ढूँढता है ।।
लड़खड़ाया सा क्यों है दौरे-ए-जूनून में,
मन्जिल बाकी है अभी, वो नई राह ढूँढता है ।।
रिश्तों की कलाबाजी है मतलब के दौर में,
जिस्म के बाजार में इंसानियत ढूंढता है ।।
वो कालिख जो पुती दाग़ के निशा बाकि है,
वहम के घेरे से सफ़ा दूधि पौशाक ढूँढता है ।।
रूह को मारकर लाश लिये फिरता है,
अहम को जिन्दा रखकर दोस्त ढूँढता है ।।
गफ़लत से बाहर आ "नादान" किरण बाकि है,
किरण से मुँह फेरकर उजाला कहाँ ढूँढता है ।।
अन्जानों के साये में अपनों को खोजता है,
बड़ा बावरा है वो जो इस कदर सोचता है ।।
बुधवार, 16 अगस्त 2017
साथ लेकर दगा दिनाँक १७ अगस्त २०१७
मैं राह तकता हूँ अक्स के लिये,
मेरा ही साया हो उस शख्स के लिये ।।
झाँककर मैंने खिड़की से देखा,
सूरज चला डूबने अस्त के लिये।।
प्रेम कहाँ जब छलित हो जाये,
वापिस हो मुसाफ़िर उसी ठौर के लिये ।।
कुहासा ना समझा इश्क के फरेब को,
चादर जब हटी तन तक्त लिबास के लिये ।।
भ्रम आज भी लपेटता है ख्वाबों के महल को,
सपनों का जाल था दौरे-ए-इश्क तय लिये ।।
सतर रहा नासमझ वक्त नजाकत तिरछी से,
उसने पाला है इश्क़ "नादान" हलाल के लिये ।।
बुधवार, 2 अगस्त 2017
नासमझी से जिन्दगी फना दिनाँक ०३ अगस्त २०१७
जब से उनसे अना हो गयी,
जिन्दगी समझो तन्हा हो गयी ।।
यूँ तो महकी थी गुलाब सी,
अब शूल सी काँटों में फना हो गयी ।।
लबरेज थी सुहागिन की चादर सी,
विधवा मानिन्द रँग विहीन हो गयी ।।
प्रभात की किरण सरीखे जो थे सपने,
काले ज़र्द सालिख रात अमावस हो गयी ।।
यूँ तो साहिल थे दोनों शिक्षा की कश्ती पर,
अज्ञान से ज्ञान की नैया तार-तार हो गयी ।।
लावा था चन्द लम्हों के सुख के भरम का,
दहेज की अग्न या रुग्न में शिकन हो गयी ।।
दोनों अना में अना करते गये,
ना समझी थी दोनों की जिन्दगी फना हो गयी ।।