बुधवार, 2 अगस्त 2017

नासमझी से जिन्दगी फना दिनाँक ०३ अगस्त २०१७

जब से उनसे अना हो गयी,
जिन्दगी समझो तन्हा हो गयी ।।

यूँ तो महकी थी गुलाब सी,
अब शूल सी काँटों में फना हो गयी ।।

लबरेज थी सुहागिन की चादर सी,
विधवा मानिन्द रँग विहीन हो गयी ।।

प्रभात की किरण सरीखे जो थे सपने,
काले ज़र्द सालिख रात अमावस हो गयी ।।

यूँ तो साहिल थे दोनों शिक्षा की कश्ती पर,
अज्ञान से ज्ञान की नैया तार-तार हो गयी ।।

लावा था चन्द लम्हों के सुख के भरम का,
दहेज की अग्न या रुग्न में शिकन हो गयी ।।

दोनों अना में अना करते गये,
ना समझी थी दोनों की जिन्दगी फना हो गयी ।।

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

इश्क -ए-तमन्ना दिनाँक ०१ अगस्त २०१७

हम जिन पर हस्ती अपनी लुटाते रहे, मिटाते रहे,
हम अक्स ढूँढते रहे प्यार का उनकी कातिल हँसी में ।।

यूँ प्यार में हम उनके विश्वास का भरम  पाले रहे,
मृग मरीचिका के भरम में जैसे जल ढूँढता है रेगिस्तान में ।।

घायल है दिल दीवाना है उनकी हया-ओ-अदा में,
बैठे है इत्मिनान किये होगा सजदा वफ़ा-ए-इश्के यार में ।।

वो दौर-ए-इश्क की कहानी फिर से गुनगुनाना चाहता हूँ,
जो लिखी थी लैला ने इंतहाँ-के-हद से मजनूँ के प्यार में ।।

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

नाग पँचमी दिनाँक २८ जुलाई २०१७

आज नाग पञ्चमी है,
चलो साथी रहते है जहाँ विषधर,
वो बमी ढूँढते है,
देश कर्णधारों ने,
ऑफिस में बैठे जिन गद्दारों ने,
मेरे स्वर्ग रूपी घर को,
डस लिया है अपनी जहरीली सोच से,
उनको दूध पिलाकर आते है,
जाते है, देकर आते है उनको गीता,
जाकर उनको बाँटते है ज्ञान,
शायद समझ मे आ जायें उनके,
दूर हो जाये अभिमान,
सत्ता मद के अँधेरे गलियारे से निकल,
शोषनता के विरुद्ध कुछ अलख जग जाये,
सोच से सच, सजर से समझ आये,
विष भरी कुंठा से निकल सेवा नजर आये,
उनका विवेक जग जाये,
सत्य,कर्तव्यनिष्ठा, परायणता आदि सद्गुणों का आगाज हो जाये,
नाग पँचमी की असली पूजा हो जायें।।

बुधवार, 26 जुलाई 2017

हरियाली तीज गीत दिनाँक २६ जुलाई २०१७

आओ सखी झूला झूले हरयाली तीज आयी रे,
सैंया भये मसखोर सैंया की बतलायें रे।।

बादल गरज गरज शोर मचाये,
मोर नाचता पंख फैलाये,
पपीहा शौर मचाये रे,
आओ सखी झूला झूले हरयाली तीज आयी रे,
सैंया भये मसखोर सैंया की बतलायें रे ।।

चल रही ठंडी ठंडी फुआर,
आओ सखी खेले गाये राग मल्हार,
रंग बदलता मौसम जिया में आग लगाये रे,
आओ सखी झूला झूले हरयाली तीज आयी रे,
सैंया भये मसखोर सैंया की बतलायें रे ।।

मेघ गरज गरज बरस रहे है,
यादों में उनकी बैठ तरस रहे है,
मन सजाकर यादों से तन भी सजायें रे,
आओ सखी झूला झूले हरयाली तीज आयी रे,
सैंया भये मसखोर सैंया की बतलायें रे ।। 

बागों में झूले पड़ी है,
झूलन को पेंगे अड़ी है,
और मिलकर पेग बढ़ाये रे,
आओ सखी झूला झूले हरयाली तीज आयी रे,
सैंया भये मसखोर सैंया की बतलायें रे ।।

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

प्यार के लिये इज्जतदार व्यक्ति की अभिव्यक्ति दिनाँक १४ जुलाई २०१७

दिल मे हसरत होती है बहुत,
लेकिन बहुत मजबूर होता है,
एक अच्छा इंसान बेचारा,
इजहारे वक्त किसी से यूँ ही मायूस होता  है ।।

होते है अरमाँ वृहद जिगर भी विशाला,
टूटकर बिखरते है जज्बात जब
दिल की जगह दिमाग से ले काम,
बदल जाते है वो जनाबे आला ।।

निगाहें देखकर उसकी ओर,
आज भी उमंग भर आती है,
मुक़द्दर की कहानी कहूँ अथवा
बेबसी नाम दूँ उसको डर है जिसका,
इज्जत है तिरछी नजर से नीलाम नजर आती है ।।

सोमवार, 29 मई 2017

आज इंसा के करतब व सीख दिनाँक ३० मई २०१७

पढ़ते सुनते सब रामायण, बने न राम से पावन है,
रावण जो जलता देख रहे, उनमें भी लाखों रावण है,
चुरती है आज भी सीतायें, पर पर्व मनायें जाते है,
और रीत निभाली जाती है।।

हम में से कितने भरत बने, सीता उर्मिला सी नारी कितनी,
सीखा क्या हमने विभीषण से, सती सलोचना सी नारी कितनी,
कैकयी को बुरा भला कहकर, प्रभु भक्त कहाये जाते है,
और इति समझली जाती है।।

जब दिन दिवाली का आयें, सज धर नर घर तैयार हुयें,
अति लक्ष्मी ना ठकुरायें, उजियारे घर और द्वार हुयें,
सब धन की पूजा करते है, ओर इंसान ठकुरायें जाते है,
क्या रीत निराली भावी है।।

अब होलिका जो आती है, होली का संदेश सुनाती है,
द्वेष ईर्ष्या हवन करो, कह होलिका जल जाती है,
नृसिँह को दुनिया पूजे है, हिरणाकुश मारे जाते हैं,
(अपना अहम जगाने को) थोड़ी सी पीली जाती है।।

अति पावन त्योहार है रक्षा बंधन का, भाई-बहन की प्रीत निभाने का,
बहन भाई को राखी बाँधती आयी है, अब नया दस्तूर है नये जमाने का,
इस राखी के परदे में राखी के ही पाप छिपाये जाते है,
क्या रीत चली निराली है।।

युवकों व युवतियों सुनलो मत फैशन के दास बनों तुम,
परदेशी तहजीब मर फँसकर स्वयं का नहीं विनाश करो तुम,
क्यूँ अर्धनग्न रहने वाले अब सभ्य कहाये जाते हैं,
इसलिये बेशर्मी पायी जाती है।।

सोमवार, 24 अप्रैल 2017

सुकमा नक्सली हमले के विरोध में दिनाँक २५ अप्रैल २०१७

कैसा होता है 56" सीना,
एक बार हमको भी दिखला दो।।

कहीं नक्सली कही जिहादी,
कारण कोई हो सिर्फ मरे सिपाही,
ये घड़ियाली आँसू है जब तक,
तब तक मूर्तरूप न दिखे कार्यवाही,
ये सीमा है यहाँ कागज के प्रमाण नही सजते,
चंद सिक्के खनकाकर अरमान नही सजते,
पापा पापा कहते गुड़िया सो जाती है,
थोड़ी सयानी सी होती सपनो में खो जाती है,
बेटा बचपन खो देता है,श्रृंगार सुहागन खो जाती है,
बूढ़े हुये माँ-बाप ना जीते है ना मरते है,
देख सफेद लिबास जवानी का दिन बहुत अखरते है,
जिनको आदत हो खेले खून की होली,
उनको काव्य में श्रंगार अच्छे नही लगते,
हर बार वही भाषा वही निन्दा की बोली,
जब तक न दिखे असर वार अच्छे नही लगते,
शहीद हुआ नही कोई बेटा शासकी घरद्वारों से,
शायद दखल दिखता नही इसी लिये आतंकी गलियारों में,
लोकतंत्र की परछाई देखों कुलीनतंत्र का कुहासा है,
सत्ता के नायकों में देखो. परिवारी व्याधा है,
शायद मरा नही कोई शासन के पहरेदारों से,
क्योंकि लड़ता है सैनिक परम्परागत परिवारों से,
कभी सुकमा नक्सली हमला,कभी पत्थर चलते काश्मीर में,
क्या करना है अन्तिम क्षण की अन्तिम नीति हमको भी समझा दो,
बहुत हुआ अब कैसा होता है 56" सीना,
एक बार हमको भी दिखला दो।।