सोमवार, 25 अप्रैल 2016

सुन्दरता को देखकर मन की आकांक्षा दिनाँक 26 अप्रैल 2016

तुम खुशबू हो या परी हो,
मेरे दिल की फूल झड़ी हो,
मै गागर हूँ शून्य रिक्त,
तुम सागर सी भरी हो।।

तुम प्यार की मूरत हो,
मेरे सपनों की सूरत हो,
देखकर जिसे प्रफुल्लित हो जाऊं,
वो हँसी मूरत हो।।

ख्यालों में लेकर जब बैठूँ,
मै कलम लिखने को,
"नादान" को मिले शब्दों की,
तुम पावन कविता हो।।

जब से देखा है तुमको,
सब निर्झर लगता है,
आ जाओ जीवन में,
तो सुहाना सावन हो।।

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

शिक्षा जे0एन0यू0 प्रकरण 16 फरवरी2016

हर कोई मस्जिद में बैठा,इमाम नहीं हो सकता,
जिसका ईमान हो गिरा,वो मुसलमान नहीं हो सकता।
तिलक लगाकर पूजा करता मंदिर में,जरूरी नहीं पुजारी हो,
जो हत्यारा हो मानवता का,वो इंसान नहीं हो सकता।।

जो भाव में भी ताव दे और सीख दे हर बात में,
संस्कारों की बात करे और इज्जत नीलाम करे बाजार में।
धर्म ज्ञान को सामने रखकर, अधर्मी कर्म करता हो,
जो जान ना पायें मर्म इंसा का, वो विद्वानी नहीं हो सकता।।

प्रहरी हो जो देश के,अलग - अलग भेष में,
जान हथेली पर रखकर, हरदम चलते जोश में।
उनकी करनी को न्याय पूर्ति करने को स्वार्थ की खातिर तौल दे,
पहनकर चौला भारती का बोलो जो दुश्मन की भाषा वो देशभक्त नहीं हो सकता।।

कैसे कोई ज्ञान केंद्र में विद्रोह की भाषा बोल गया,
हो सकता है राजनीति के समर शेष में शक्ति तुला को तौल गया।
जरूरी नहीं जो उतारे जो चीर को वही दुःशासन हो,
कदम है जिसके वह बढ़ चले आँचल के उतरन को उसका सत्कार नहीं हो सकता।।

बुधवार, 27 जनवरी 2016

नववर्ष की बेला 01 जनवरी 2016

शुभप्रभात शुभदिवस शुभनववर्ष

बेला है नववर्ष की चलो ख़ुशी मनाये,
ध्येय धरे हम नेह की मंगल कामना गाये||

हो ऐसा ये वर्ष हमारा,मानव जाति प्रफुल्लित हो,
भारत बनें सिरमौर विश्व का, चहु ओर ख्याति छाये||
बेला है नववर्ष की चलो....................||1||

युवा चले सतकर्मो की ओर, वर्द्ध धर्म मार्ग दिखलायें,
शिशु हो जायें संस्कारी,ऐसी शिक्षा नीति अपनाये||
बेला है नववर्ष की चलो....................||2||

विज्ञानी नित करें चमत्कार,दशों दिशाएँ चकराये,
रक्षा,चिकत्सा,भरण-पोषण,सब पूर्ण हो जाएँ।।
बेला है नववर्ष की चलो....................||3||

स्पर्धी ऐसे हो क्रीडभारती,नित नये आयाम बनायें,
पछाड़ रूस,चीन को,हर खेल में ओलम्पियन बन जायें||
बेला है नववर्ष की चलो....................||4||

जीवन शैली हो धर्म हमारा,यह सब जन जायें,
आर्यन बन सब मानव सत्कर्मो में ढल जाये।।
बेला है नववर्ष की चलो....................||5||

कल्पना कर रहा "नादान" काश ऐसी छवि बन जायें,
हो जायें स्वपन सारे साकार,हम फिर विश्व गुरु कहलायें||
बेला है नववर्ष की चलो....................||6||

कॉपीराईट सर्वाधिकार सुरक्षित -
पुष्पेन्द्र सिँह मलिक "नादान"

गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

अलविदा पुरातन 31 दिसंबर 2015

बीत गया जो बीत गया,वो समझो एक सपना है,
आगे देखो मंजिल है बाकि,जो शेष है वही अपना है||

क्या खोया क्या पाया हमने,हिसाब ये इतिहास करेगा,
कर्तव्यबोध से जो मुकाम, भविष्य मे यक्ष दिखना है||

बीत गया जो बीत गया.......................||1|

रच रहे है जो आज नींव,कल के स्वपन सजाने को,
कमी रह गयी जो बुनियादों में,उसको दूर कल करना है||

बीत गया जो बीत गया.......................||2||

बन गया जो विक्षोभ यहाँ पर,कलंकित हुई जिससे मानव जाति,
बन गयी जो दीवार यहाँ पे,चूक हुयी कहाँ उसका पता लगाना है||

बीत गया जो बीत गया.......................||3||

चूके थे जिस छोर पे हम, उस पर ध्यान लगाना है,
शिक्षा की अलख जगा जगाकर,मन का भेद मिटा उसको दूर गिराना है||

बीत गया जो बीत गया.......................||4||

गुरुवार, 9 जुलाई 2015

मध्य वर्ग व किस्मत। दिनाँक 09 जौलाई 2015

यह कविता मध्य वर्गीय इंसान की व्यथा पर आधारित है जो किस्मत के हाथों मेहनत के वावजूद भी ऊपर नही उठ पता है उसकी व्यथा को महसूस कर चंद शब्द लिखने की कोशिश की है।

जाने क्यों जी रहा है,ये जहर क्यों पी रहा हैं।
अपने आप से अपने को छलता हैं,
चुपचाप ही आहें भरता हैं,
न किसी से कहता हैं,हरदम सोच में रहता हैं
मेरा भी कोई अपना हो, सच ये मेरा सपना हो,
पता नहीं कौन सा अभिशाप हैं,
कर्म नेक है मेहनत भी विशेष हैं,
सुख तो केवल आस हैं, फल नहीँ पास हैं,
चूक कहाँ होती है,
कर्मयोग क्यों निष्फल हुआ जाता हैं,
क्या कर्म क्रमबद्ध हुआ नही जाता हैं,
क्या कर्मयोग को भाग्य दोष सताता हैं,
ये कैसी विडम्बना हैं,
केवल जीवन में कल्पना ही कल्पना हैं,
सम्पूर्ण जीवन जीना मात्र एक सपना हैं,
जीवन जीने को, जीने का सुख पीने को,
केवल बौद्धिकता ही नहिं जरूरी है,
बौद्धिकता के साथ निभाने को,
जीवन सुगम बनाने को,
किस्मत का साथ जरूरी हैं,
दे भाग्य साथ अगर मणिका भी आ जाती है,
बौद्धिकता तो मणिका के आकाओंके चरण दबाती हैं,
द्विज युगलबन्दी भाग्य के नव चाँद सजाती है,
यह बात तो दीगर हैं श्रंखला बदस्तूर जारी हैं,
यह सर्वसंज्ञान है कि कर्म तो प्रधान है,
फिर भी किस्मत महान है,
किस्मत से ही एक पाँच सितारा जीवन जीता हैं,
दूजे संग जन्मा फुटपात का जीवन जीता हैं,
है ऐसा भी एक वर्ग जो न जीता हैं ना मरता है,
ये है विडम्बना किस्मत की,
दोनों के बीच मध्य वर्ग ही पिसता है,
यह वर्ग मध्य है किस्मत का मारा,
छलाजाता है अपनों से फिर भी बीच रहता है,
इज्जत की खातिर सबकुछ सहता है,
समाज में स्थापित करने को,
कर-कर जद्दोजहद जी रहा हैं,
यों हि जहर पी रहा हैं।

शनिवार, 16 मई 2015

अदृश्य बेईमान १७ मई २०१५

देखें बहुत ईमानदार, नहीं मिले ईमान वाले,
जो हुये चर्चित जितने, वो उतने बडे हुये ईमान वाले।।

कई देखें है साहबान, रु एक तन्ख्वाह लेते,
गाँव में फांके थे कल, आज शहर में महलों वाले।।

जिन्होंने लिये सर्टिफिकेट उम्र भर, ईमानदारी के,
टेबल के नीचे मिलें हाथ उनके, ईमान बेचने वाले।।

खाली है खातों में जो,सफेद कुर्ते या सूट-बूट में है वो,
शायद काली कमाई से है वो, आज कोठी-बंगलो वाले।।

एन.जी.ओ या धर्मार्थ चलाते है जो, गरीबों के वास्तों,
काटकर हक मुफलिसों के, शौक पाले है रहीसों वाले।।


सोमवार, 20 अप्रैल 2015

कर्म और सम्बन्ध २० अप्रैल २०१५

मतलबी दुनिया में कौन किसी का होता है,
धोखा वही से मिलता है जहाँ भरोसा होता है।

जिंदगी एक फसाना है वैभवता की होड में,
है सम्बन्ध समाप्त सब लोलुपता कि खोड में।

मोह फसाँ है माया में माया पास सब अपनाते,
कंगाली अगर आ जाये रिश्ते भी है दरक जाते।

जीवन एक रंगमंच है घटनाएँ है नटकार,
हारे तो विलयन जीत गये तो कलाकार।

अरे 'नादान' कर्म का करता जा तू दान,
सफलता में सब अपने विफलता मे होगी पहचान।

माया तो आनी-जानी है परोपकार साथ निभाता है,
होता है महान वही जिसका नाम सबकी जुबा़ँ पर होता है।