मंगलवार, 18 मई 2021

महामारी से भाव दिनाँक १९ मई २०२१ दिन बुधवार

दिल के झरोके से थोड़ी सी आवारगी झलकने ही लगी थी,
जिंदगी कुछ कुछ मस्त बयार सी चलने ही लगी थी, 
कुछ कदम बढ़े ही थे कि कुदरत का नजराना ऐसा मिलने लगा,
कमबख्त हर दिल की धड़कन भय में बदलने लगी,
वैसे तो हम रोगी हो ही चुके थे मनोविज्ञान से,
कमबख्त उम्र के रोग से सबल होगा इलाज अज्ञान थे,
सोचा जब हमने उमीदों को अब नजराना मिलेंगा,
बेहतर होगा कल कल से नव आयाम मिलेगा,
बेबसी सफ़र करने लगी बेबस लोग ओर लाशों को देखकर,
लाश भी पूछती है लाश से कब होगा उद्धार दशा देखकर,
गङ्गा जी भी उद्वेलित है आज मुक्ति का यह हश्र देखकर,
हे जटाधारी अब दयाकर रहा नही जाता अब भागीरथी की दशा देखकर ।।

आपका परम् स्नेह आकांक्षी :- पुष्पेन्द्र सिँह मलिक " नादान"

शनिवार, 27 मार्च 2021

होली दहन पर्व २८मार्च २०२१

मौसम जब मुस्कराने लगे,
कोयल गीत गाने लगे,
बसन्त बीच बहार कहकहाने लगे,
भवँर देख कली-कली गुनगुनाने लगे,
फूल भी रँग तरह-तरह के बरसाने लगे,
दिल कहने लगा चलो होली मनायें चलो होली मनायें ।।
महीना फाल्गुन का जब आने लगे,
दिल बन राग फ़ाग गाने लगे,
यौवन की हस्ती जब मस्ती दिखाने लगे,
अंग अंग में चढ़ भंग रँग दिखाने लगे,
टेसू रँग केसरिया छाने लगे,
दिल कहने लगा चलो होली मनायें चलो होली मनायें ।।
राग-द्वेष जब हवन सजाने लगे,
जलकर मैं मन पपीहा बन जाने लगे,
प्रीत की डोर मन के उस छोर जब जाने लगे,
हर जन मन रास रचाने लगे,
तजकर भूल छोड़ शूल संग संग एक रँग हो जाने चले, 
रूठकर जो बैठे है उनको मनाने चले,
दिल से दिल मिला अंग अंग संग रँग लगाने चले,
दिल कहने लगा चलो होली मनायें चलो होली मनायें ।।
                "नादान"

शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

नववर्ष तुमने कहा और हमने मान लिया दिनाँक ०१ जनवरी २०२१ दिन शुक्रवार

तुमने कहा और हमने मान लिया,
नववर्ष में हैं अभी दिन शेष,
लेकिन हमने संज्ञान लिया,
तुमने कहा और हमने मान लिया।।
न प्रकृति ने रंग दिखलाया,
न धरा ने यौवन सजाया,
सर्द हवा देती है दर्द घना,
बर्फ ऊपर कुहासा है पड़ा,
न दे कुछ दिखायी, 
लेकिन तुमने जब नव राह सुझायी,
तब हमने संज्ञान लिया ।।
युगों युगान्तर से रीत है भावी,
भोर की किरण निकलते दिन है हावी,
रात निशाचरी में दिनमान है बदले,
कैसे कहे वर्षमान है बदले,
फिर भी रीत नयी तुमने है बतलायी,
तुमने जब नव राह सुझायी,
तब हमने संज्ञान लिया ।।
न नव अंकुर फूटे, 
न नव कलरव गीत सुनाये,
न प्रकृति दुल्हन बन सजी,
न स्नेह की सुधा ले आये,
न फाल्गुन की मस्ती तने,
न चैत्र की प्रतिपदा है आये,
फिर क्यों कर मन नव वर्ष मनायें,
पर तुम मना रहे और हमे भी समझाये,
यह रीत तुमने ही बतलायी,
तुमने जब नव राह सुझायी,
तब हमने संज्ञान लिया ।। 
तुमने कहा हमने लिया संज्ञान,
तुम भी लो मान अब,
हम भी देते है कुछ प्रमाण,
इतिहास के झरोखे बतलाते है,
नववर्ष के प्रथम दिवस को याद कराते है,
प्रकृति के एकदिवसीय क्रम को समझाते है,
ब्रह्मा जी के निर्माण दिवस को,
भूल रहे जो ऋषी दयानन्द रचित,
आर्यो के पुनःनिर्माण दिवस को,
आदिकाल के गुणन दिवस को,
हम रामराज्य के अभिषेक दिवस को,
शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को,
विक्रमादित्य ने अलंकृत किया जो,
विक्रम सम्वत डाल दिया जो
बतलाते है विक्रमादित्य के विजय दिवस को,
भारतवर्ष के विश्व विजय दिवस पर्व को,
हम नव वर्ष दिवस कह मनाते है,
नववर्ष में हैं अभी दिन शेष,
लेकिन हमने संज्ञान लिया,
तुमने कहा और हमने मान लिया।।
अभी ओर थोड़ी दूर चलो,
आर्य और सनातनी संस्कृति को पूर चलो,
दिया जो प्रकृति ने सहेज उसे भरपूर चलो,
जिस दिन लिया सत्पुरुषों ने जन्म,
उस दिन मना खुशियाँ भरपूर चलो,
सन्त झूलेलाल हुये, उतर जग प्रसिद्धि छुये,
मान बढाते गद्दी का गुरु अङ्गद देव हुये,
डॉ हेडगेवार भी जिसदिन धरती छुये,
वीर गोकुला जी दे शहादत मोक्ष गति को प्राप्त हुये,
दिन उसी तिथि को सूर्य चन्द्र नक्षत्र छुये,
प्रकृति के एकदिवसीय क्रम को,
नववर्ष के प्रथम दिवस को,
दिवस के एक-एक क्रम को, 
वेद-पुराण समझाते है,
तब हमने संज्ञान लिया ।। 
जब तुमने कहा हमने लिया संज्ञान,
तुम भी लो मान अब,
हम भी देते है कुछ प्रमाण,
इतिहास के झरोखे बतलाते है,
नववर्ष के प्रथम दिवस को याद कराते है,
दिवस क्रम के हेर फेर में,
ईस्वी वर्ष के उस दिवस को,
जब दी शुभकामना मेल-मेल में,
तब हमने संज्ञान लिया, 
नववर्ष हमने भी मान तुम्हारा मान लिया।।
नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें ।।
                   "नादान"

मंगलवार, 29 दिसंबर 2020

आज के समय का वातावरण- व्यवहार इन्सान का दिनाँक २९ दिसम्बर २०२० दिन - मंगलवार

सच को सच कहना जैसे गुनाह हो गया,
देकर सर्वस्व जैसे सज़ावार हो गया,
कहा जिसने भी सच को बहुत दूर बहुत दूर...यारा बहुत बहुत मजबूर हो गया ।।

अदब का लिबास है उनकी बातों के शरीर पर,
हँसी है लपेटी कपट को शमशीर कर,
सत्य का पुरोधा खड़ा अकेला रह गया।।

करते बात पीठ पीछे जो बड़े होशियार हो गये,
लेकर चले जो झूठ का सहारा सामाजिक यार हो गये,
सच बोलकर "नादान" मगरूर हो गया ।।

छिछली चुनी चाहें राह, जीतकर वो तन गया,
आगे बढ़ जो चला पथ पुरोधा बन गया,
मतलब निकाल जो गया परवाना बन गया ।।

मतलबी फ़साने हल करने को,
तू भी पाला बदल लेता "नादान"
जो भी पीर बना वो बेगाना हो गया ।।







सोमवार, 28 दिसंबर 2020

वर्तमान में मनुष्य दिनाँक २९ दिसम्बर २०२० दिन मंगलवार

 नहीं अब मूल्यों का मूल्य सब बेकार हुये,
धरनि, धरन,नभ,पित्र, पिता सब के सब,
पालक जो, सब के सब बौने,नव नव तारणहार हुये,
भले मनुज जो कदम बढ़ाये,कर्महीन रोड़ा अटकाये,
गिनती होती जिनकी धिक्कारों में वो सब नम्बरदार हुये ।।

अचल कुल घालक है जो पालनहार वही बनायें,
जिन सर गठरी पाप धरि, उन पर ही है सिरमौर सजाये,
पाप पुण्य के वाचक बन खेल शतरंज का सजा रहे,
बाजी रखी निज हाथों में वही कर्णाधार बनायें ।।

भोला सत्य सिसक रहा है चमचों के व्यवहारों से,
काँखति हँसी झूठी बाते अच्छी है सच्ची-मुच्ची आँहों से,
सत्य हारता आज झूठ धार एक-एक कतार से,
खड़ा अकेला सोच रहा कैसे रे आधार बनाये ।।

जीवन मूल्य तुला है "नादान" उस प्रभ की कृपा पर,
किसको फल है किसको मल है गुणन ये उसका पल पल है,
राजा से रंक बने बने रंक से राजा जिनका चलता धेला है,
जिसकी करनी उसी को भरनी तू क्यों रोता चक्षु मल मल है ।।
                     "  नादान"
              

मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

अंश मेरी किस्मत से

नजर न लगे इस खूबसूरती को,
जीवन का यौवन छलकता रहे,
बिखेर रही जो रंग जीवन की पृष्ठभूमि पर,
लम्हों की कहानी सदियों तक बरकरार रहे,
मेरी किस्मत का किस्सा खत्म है,
तेरे दर की राह के पहले मोड़ पर,
मैं खाली हूँ हर तरह प्रारबद्ध से,
प्रारबद्ध से ही तेरी हस्ती में है चार चाँद लग रहे,
कदम दो कदम जो साथ मिले,
मन मिले हुये रास्ते छिलछले,
मेरी चोट है मेरी खोट से,
तू क्यों लगाये फिर भी लगाये मरहम,
जिन्दगी रहे सलामत ज़िन्दगी भर,
जिन्दगी मन सहलाये जिन्दगी के वास्ते ।।
      

शुक्रवार, 13 नवंबर 2020

दशहरा दिन रविवार दिनाँक २५ अक्टूबर २०२०

मन रखकर पाप पुण्य का हर्ष मनाते हो,

एक रावण को मारने हर वर्ष रावण सजाते हो,

राम भजो तो राम आचरण ध्यान रखो,

मन मे बैठा रावण घर से तुम भी बाहर करो,

दश शीश है दश दिशायें चहुँ ओर  रावण की गर्जनाये,

शीश धरो ईश से अपने ही भीत से कर वज्र आकांक्षायें,

घर घर रावण है अपने घर बहुत से रावण है,

इस बार प्रण है बाहर निज घर से एक रावण है,

दशमी है विजय उत्सव की राम धीर वीर वर की,

दश शीश गिरा ईश बने पूजित मर्यादित कोशलाधीश की,

एक रावण बाहर कर मन अन्दर राम धरे,

प्रण धर काज करे राम राज्य स्वप्न साकार करे ।।