आगे कदम बढ़ा दिया,
आगे ही बढूँगा,
न रूक सका किसी से,
न रूका हूँ कभी,न थका हूँ कभी,
न थकूँगा कभी,न रुकूँगा कभी ।।
ढला हूँ जब वजह किसी से,
किरण सूरज की भाँति चमका हूँ,
फिर सुबह किसी से,
आशा हूँ,
हो परिस्थिति कितनी विपरीत,
न डगमगाये कदम,
हरदम साहस से लिया काम,
जोश न होने दिया कम,
देखें है बहुत अक्स मैंने
इतिहास के आईने से,
लिखे जो कलमकारों ने,
दरबारों के गढ़ने से,
खण्ड-खण्ड हुआ सजा अखण्ड रूप,
द्वेष,लालच,छल,कपट
बहुत से हथियारों से,
चोटिल माँ भारती का सम्मान,
हुआ है कुछेक गद्दारों से,
अखण्ड रूप सजे भारती का ठाना है,
विश्व गुरु मानदण्ड का मान निभाना है,
वसुधैव कुटम्बकम का संदेश
सार्थक कर दिखाना है,
आलोचनायें कमियों का आईना है,
आईना देखते दिखाते रहिये,
राह आसान हो जायेगी सन्देश पुराना हैं,
कर्म धर्म है, कर्म पूजा है,
कर्म योग है,
कर्मफल जीवन का भोग मर्म है,
कर्मयोग से महायोगी बन दिखलाना है,
जीवन सुफल बने हर प्राणी का,
भारत सिरमौर बने ऐसा जतन बनाना है,
लाल माँ भारती का पहचान है बस भारतीय,
मानव है देवत्व बन दिखाना है,
समल सफ़ल नही होता जब तक,
बढ़ा कदम न रोकूँगा कभी,
आगे कदम बढ़ा दिया,
आगे ही बढूँगा,
न रूक सका किसी से,
न रूका हूँ कभी,न थका हूँ कभी,
न थकूँगा कभी,न रुकूँगा कभी ।।
शुक्रवार, 17 नवंबर 2017
मेरा व्यक्तित्व दिनाँक १७ नवम्बर २०१७
रविवार, 12 नवंबर 2017
पसन्द प्यार की लड़कियों में दिनाँक १२ नवम्बर २०१७
जज़्बात के ख्यालाती हद से,
कुछ पागल होती है लड़कियाँ,
सादगी कर किनारे अर्थ के फेर में,
मझधार में इश्क के रोती है लड़कियाँ ।।
सूकून का दौर कहाँ मिलता है,
इश्क दौरे आलीशान फरेब से,
जवानी और दीवानी दिखावटी में,
अश्क़ बीच मझधार बहाती है लड़कियाँ ।।
किसको इश्क़ में ईमान पसन्द है,
कहने और सुनने में अच्छा है बहुत,
सैनिक का ईमान व आमान पसन्द है,
पूर्व बन्धन कहाँ उनका प्यार पसन्द है।।
बुधवार, 8 नवंबर 2017
प्रभु बिन कौन किसी का दिनाँक ०८ नवम्बर २०१७
इस निरीह दुनिया मे कौन किसी का होता है,
चिता की वेदी पर दोस्त समय पूछ रहा होता है,
माटी को माटी में मिलने में,समय लगेगा कितना,
अग्नि में अग्नि मिल चलें,जितना जल्दी हो सके उतना,
वन भरा है वृक्षों से,तना लगा ना कुटिया में,
ये अपना है सपना है,जो छोड़ चला गया दुनियाँ से,
यहाँ भरम क्यों पाले है,लोग बड़े मत वाले है,
धर्म-कर्म कुछ ना समझे बस बहम को पाले है,
समय उसी का होता है,जो चल रहा अकेला होता है,
कलम उठाता नही कर से,लिख रहा इतिहास होता है,
उकेर कर सूत्र जीवन के नव मार्ग सजाता जा,
डगर कठिन होती है जितनी,निकट प्रभु उतना होता है,
"नादान" समझता है बुरा किया उसने ऐसा कर,
समझ कौन सका लीला उसकी,अतंतः शिक्षक की मार का फल अच्छा होता है।।
मंगलवार, 5 सितंबर 2017
०५ सितम्बर २०१७ शिक्षक दिवस
प्रतिदिन नमन मेरा प्रथम गुरूवर को,
नमन मेरा प्रतिदिन अंतिम गुरूवर को ।।
गुरू ज्ञान है गुरू मान है,
गुरूओं कारण ही पहचान है,
दिया न होता ज्ञान गुरू ने,
ज्ञान रहित होता अन्ध मेरा मन,
चक्षु रहित पशुवरत होता तन,
प्रतिदिन नमन मेरा प्रथम गुरूवर को,
नमन मेरा प्रतिदिन अंतिम गुरूवर को ।।
प्रथम वन्दन भोर से पहले,
आँख खुले तो मुझसे बोले,
उठकर बेटा पहले मुँह धोले,
माँ हरदम रहती चिन्तन में,
स्वर्ग बसा जिनके चरनन में,
प्रतिदिन नमन मेरा प्रथम गुरूवर को,
नमन मेरा प्रतिदिन अंतिम गुरूवर को ।।
साथ मे वन्दन उस पिता को,
जिसने भले बुरे का ज्ञान दिया,
न माना तो डाँट दिया और साथ दिया,
चिन्तन धर सुत का निज सुख त्याग किया,
नख-सिख तक ऋणी है उनको न कैसे ध्यान धरूँ ।।
प्रतिदिन नमन मेरा प्रथम गुरूवर को,
नमन मेरा प्रतिदिन अंतिम गुरूवर को ।।
दूजे चरण पखारूं उनके,
जिन्होंने अक्षर ज्ञान दिया,
समय बद्धता और अनुशासन ज्ञान दिया,
जीने का सामान दिया,
शिक्षक बन मुझमें स्व का भान किया,
प्रतिदिन नमन मेरा प्रथम गुरूवर को,
नमन मेरा प्रतिदिन अंतिम गुरूवर को ।।
वन्दन है मेरा फिर उन चन्दन को,
जिन्होंने रिश्तों का भान दिया,
बन लाड़ो-दाऊँ कभी चिढ़ाया कभी रिझाया,
मुझे खेल से जीवन खेल सिखाया,
भौजाई से ताई तक सबने कुछ व्यवहार दिया,
प्रतिदिन नमन मेरा प्रथम गुरूवर को,
नमन मेरा प्रतिदिन अंतिम गुरूवर को ।।
चलो नमन करूँ उन मित्रों को,
जो जीवन के हर क्रम में साथ रहे,
जिनसे कभी साद रहे और कभी वाद रहे,
सुख की बेला में जिनसे ही उल्ल्हास रहा,
दुख की घड़ी में घर के चिराग आबाद रहे,
प्रतिदिन नमन मेरा प्रथम गुरूवर को,
नमन मेरा प्रतिदिन अंतिम गुरूवर को ।।
अन्तिम वन्दन है अवसर को,
जो सबसे छूटा पूरा किया उस कसर को,
अवसर है ऐसा ज्ञान हो जाये पूरक जो,
भूले नही भूला जाता उम्र भर रहता संज्ञान,
अपना-पराया,भला-बुरा सब सिखा देता हैं वो,
प्रतिदिन नमन मेरा प्रथम गुरूवर को,
नमन मेरा प्रतिदिन अंतिम गुरूवर को ।।
हर जन कण है वन्दनीय वो जिनने,
जीवनक्रम में कुछ ज्ञान दिया,
हर दिवस है गुरदिवस,
जिसमें हमने भान किया,
वन्दन के चन्दन को क्यों दिन बँधाऊँ,
प्रतिदिन नमन मेरा प्रथम गुरूवर को,
नमन मेरा प्रतिदिन अंतिम गुरूवर को ।।
शिक्षक बन जिन्होंने उपकार किया,
जन्म दिवस है आज उनका मनाओं
डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन नाम जिनका,
नित्य स्मरण कर ऐसा कर्म कर,
तम दूर करो उनको वन्दन कर जाओ,
प्रतिदिन नमन मेरा प्रथम गुरूवर को,
नमन मेरा प्रतिदिन अंतिम गुरूवर को ।।
मंगलवार, 22 अगस्त 2017
मैं और प्यार दिनाँक २३ अगस्त २०१७
दिल में जिनकी तस्वीर सजी है,
सदियों से,
वो चेहरा नूरानी है,
हसरत थी जो कल,
वो आज भी बाकि है,
पा जाऊँ, सपनों के सौदागर को,
ये ख्यालात आज भी नव है,
बस दिल मे तस्वीर बसी है वो पुरानी है,
जीवन नित आगे क्रमबद्ध है,
जैसे सूर्यास्त के बाद उदय,
रात्रि के बात प्रभात का होना,
किन्तु तारीखे बदल जाती है,
हर नई सुबह की किरण के साथ,
मुजरिम हूँ यादों का,
जो आज भी जिन्दा हैं,
नव उतनी ही जितनी भौर की किरण,
क्यों साँझ की तरह उन्हें अँधेरे में नही पहुँचा पाया,
जज्बातों को अधरों पर ला न पाया,
शायद बहुत देर हो चुकी,
प्यार इसलिये आज कशमकश में है,
शायद दिल को झुठला पाता,
यादों को रात के अंधेरे में ले जाता
ताकि नया सवेरा किसी नये जज्बात का बीजारोपण कर सकें,
नव ख्यालात को जन्म दे सकें,
लेकिन ये हो न सका,
क्योंकि दिल मे जो बसा वो प्यार सच्चा था, है और शायद न मिट पायेगा, यथार्थ की तरह,
चूँकि ये मेरा प्यार है मेरी तरह ।।
रविवार, 20 अगस्त 2017
जब से देखा उसे दिनाँक २१ अगस्त २०१७
जब से देखा उनको, चाँद नजर आया है,
मन हिडोले खाने लगा प्यार नजर आया है ।।
देखकर तुझे मन हैरान है,
सूरत से सीरत का ख्वाब नजर आया है ।।
उसकी हँसी देखकर झूमने लगा,
शायद ख़ुशी का नया पैगाम आया है ।।
नैन भी बातें करने लगे है अब,
जब से काजल ने हाथ मिलाया है ।।
काजल ने नैनों से कहा इठलाते हुये,
होंठ चुप है,शायद बरसात का मौसम आया है ।।
चेहरे से नकाब जूँ ही उतारा उसने,
शरमा गया चाँद मेरा छुईमुई नजर आया है ।।
जब से बात करने लगे उनसे इजहार की,
गफ़लत सी होने लगी इन्तजार नजर आया है ।।
चाँद ने ली ओढ़ खामोशी की चादर,
चुप-चुप सा आफताब नजर आया है।।
गुरुवार, 17 अगस्त 2017
अन्जानों में अहम खोजना दिनाँक १८ अगस्त २०१७
अन्जानों के साये में अपनों को खोजता है,
बड़ा बावरा है वो जो इस कदर सोचता है ।।
कौन कहता है गिरते नही जाँबाज जंग-ए-मैदान में,
उसे क्या पता जो मैदान छोड़ स्थान ढूँढता है ।।
लड़खड़ाया सा क्यों है दौरे-ए-जूनून में,
मन्जिल बाकी है अभी, वो नई राह ढूँढता है ।।
रिश्तों की कलाबाजी है मतलब के दौर में,
जिस्म के बाजार में इंसानियत ढूंढता है ।।
वो कालिख जो पुती दाग़ के निशा बाकि है,
वहम के घेरे से सफ़ा दूधि पौशाक ढूँढता है ।।
रूह को मारकर लाश लिये फिरता है,
अहम को जिन्दा रखकर दोस्त ढूँढता है ।।
गफ़लत से बाहर आ "नादान" किरण बाकि है,
किरण से मुँह फेरकर उजाला कहाँ ढूँढता है ।।
अन्जानों के साये में अपनों को खोजता है,
बड़ा बावरा है वो जो इस कदर सोचता है ।।