गुरुवार, 4 सितंबर 2014

शिक्षक (गुरु) ०५ सितम्बर २०१४

शिक्षक दिवस है आज जरा भान करें,
गुरु पूजनीय गुरु वंदनीय आओ इनका सम्मान करें।।

गुरु ज्ञान सिखलाते,अच्छे बुरे मे भेद बताते,
जीवन बोध कराते आओ उनका सम्मान करे।।

शिक्षा है मूल मंत्र, जीवन का आधार तंत्र,
बिन शिक्षक कैसे मिलती आओ उनका गुणगान करें।।

वेद पढे़ कुरान पढे़ चाहे बाईबिल या रामायण पढे़,
अक्षर ज्ञान दिया गुरु ने आओ उनका व्याख्यान करें।।

जीवन का आधार गुरु हैं पूजा का सार गुरु है,
मेरे शिक्षक मेरे गुरु है आओ इनका गुणगान करें।।

मेरे जीवन के तीन स्तम्भ मात-पिता और गुरु है,
प्रथम ज्ञान दिया मात-पिता ने दूजे भगवान गुरु है।।

मात-पिता ने दिया स्वर ज्ञान जीवन विज्ञान गुरु ने,
शिक्षा दी जिसने दीक्षा दी आओ उनको नमन करे।।

बुधवार, 3 सितंबर 2014

अपनी व्यथा ०४ सितम्बर २०१४

कहाँ गए वो सपने सुहाने,
जिनको बुना था मैने ख्यालों मे।
बचपन तो बचपन होता है सुना था,
सब ज्ञान बोध से अनजाना,
प्यार-दुलार था सब कुछ जिसका खजाना,
ना मिला खजाना रहा अनजाना सबसे,
कहाँ गए वो सपने सुहाने,
जिनको बुना था मैने ख्यालों मे।
अब हुआ व्यस्क तो हुआ रस्क,
शिक्षा का बोध हुआ सुबोध हुआ,
संसाधन ना साधन कमी रही असाधारण,
साया भी उठा पिता का कारण बना अकारण,
कहाँ गए वो सपने सुहाने,
जिनको बुना था मैने ख्यालों मे।
अब बालक बना पालक परिवार का,
ना साथ किसी अपने साथी या रिश्तेदार का,
सब मतलब कि शिक्षा है यारी और रिश्तेदारी,
सब खुले  खजाने मेहनत के है मुहाने,
कहाँ गए वो सपने सुहाने,
जिनको बुना था मैने ख्यालों मे।
अब योगदान हुआ जब जवान हुआ,
सेना कि ईकाई में अपना भी अंशदान हुआ,
अंश के प्रतिमान से नये संबंधों का निर्माण हुआ,
संबंध बनें मंगल के लगा जीवन सुधरेगा,
संबंध थे विकारित खो गये सपने सुहाने,
कहाँ गए वो सपने सुहाने,
जिनको बुना था मैने ख्यालों मे।
परिवार के पोषण के लिया जीता हूँ,
दुनिया को देख व्यथित रहता हूँ,
किसी को अपना पाता हूँ ना किसी से कहता हूँ,
दोराहे पे खड़ा हूँ जिसकी कोई मंजिल है ना मुहाने,
कहाँ गए वो सपने सुहाने,
जिनको बुना था मैने ख्यालों मे।

फरियाद विरही की ०३ सितम्बर २०१४

ऐ मेरे हमसफर तू लोट के आजा।
तुझ बिन सब सूना- सूना लगता है।।
घर का आँगन, खेत खलियारा,
कल तक था जो मुझको प्यारा,
सब बेगाना लगता है,
ऐ मेरे हमसफर तू लोट के आजा।
कल तक हरी-भरी थी मेरे जीवन कि बगिया,
आज वीरान है जीवन की नगरिया,
कैसे सहूँ ये अकेलापन,
ऐ मेरे हमसफर तू लोट के आजा।
ऋतुओं के मेले भी मुझको अब खलते है,
दिन के उजाले अमावस की रात लगते है,
अब मान भी जाओ,
ऐ मेरे हमसफर तू लोट के आजा।
अगर तुम ना आये तो मै जी ना पाऊँगा,
कैसे कहूँ कि तुम बिन मै रह ना पाऊँगा,
एक बार खता तो बता जा,
ऐ मेरे हमसफर तू लोट के आजा।
अब साँस अटकी है कोई तुम मे,
अब अन्तिम बेला है जीवन की,
मुक्ति में तो साथ निभा जा,
ऐ मेरे हमसफर तू लोट के आजा।

शनिवार, 30 अगस्त 2014

प्रीत ना होती जग में ३० अगस्त २०१४

प्रीत न होती जग में क्या हो जाता,
ना बनते मीत जग सूना हो जाता।
या विश्वदेव कुटम्बकम का नारा सार्थक हो जाता,
प्रीत ना होती जग मे क्या हो जाता।।
ना बंधते बंधन कसमों के,
प्यार वफा जैसे शब्दों के,
ना तडपन होती मन में,
ना धड़कन बढ़ती दिल में,
ना होती जग में हँसाई,
ना होती कोई रूसवाई,
ना बनती कोई बातें,
ना होते रिश्तों के धागे,
ना होता सजना संवरना,
ना होता बनना बिगड़ना,
ना दिल में चाहत होती,
ममता भी ना होती सीनों में,
निर्जीव सी दुनिया होती,
पर जीवन सजीव हो जाता,
निर्जीव दुनिया में अपना सपना हो जाता,
क्योंकि ना मतलब होता मतलब का,
जो होता तेरा वो मेरा हो जाता,
ना कोई कहता मेरा सब सबका हो जाता,
ना होता फसाद धर्म नाम पर,
जाति होती बस मानव नाम पर,
ना होता सीमा का अतिक्रमण,
स्वछन्द होता विश्व भ्रमण,
होती सबको एक ही आशा,
सब समझते प्यार की भाषा,
नादान भी जग में जी पाता,
सपना है अपना सार्थक हो जाता,
ना बनते मीत जग सूना हो जाता।
या विश्वदेव कुटम्बकम का नारा सार्थक हो जाता,
प्रीत ना होती जग मे क्या हो जाता।।

गुरुवार, 28 अगस्त 2014

इलाज चाहिए २८ अगस्त २०१४

दिल की बीमारी है,इलाज चाहिए,
जहान मे रहे जान तो एक जान चाहिए।।

उम्र का तकाजा है इस रोग का गुण,
निदान के लिए मेहमान नया चाहिए।।

तलाशती है निगाहें हर चेहरा बने कोई हमराह,
सूरत के साथ सीरत की जुगलबन्दी चाहिए।।

नेमत है खुदा का प्यार अगर दे बख्सीस,
रहमतों की दरकार है कोई एक नज़र चाहिए।।

नासाज है सावन का हर एक पल बूँद के बिना,
पपीहा है आज दिल जो बुझे प्यास बरसात चाहिए।।

तडपन मिट जाये मन की धड़कन बनकर,
इजहार बन जाये इलाज वो दवा चाहिए।।

मंगलवार, 26 अगस्त 2014

बेगाना २७ अगस्त २०१४

रहा अपनों की शादी में अब्दुल्ला दीवाना,
ना मैंने जाना किसी को ना किसी ने मुझे पहचाना।।

ये दुनिया है मेरे लिए उलझी एक कहानी,
मै तो हूँ नादान ना समझी दुनिया ने नादानी,

हजारों मुसीबतें है राहों मे हर राह से मै अनजाना,
ना मैंने जाना किसी को ना किसी ने मुझे पहचाना।।

कल जो मेरे अपने थे जो मेरे सपने थे,
था मै भी उनका वो माला मेरी जपते थे,

आज नहीं वो जानते कौन हूँ उनके लिये मै अनजाना,
ना मैंने जाना किसी को ना किसी ने मुझे पहचाना।।

यहाँ हर जर्रा है धोखा ये दुनिया है मतलब की,
ना रख चाहत किसी से किसको पडी है तेरे गुरबत की,

जीना है मान से सम्मान से तो खुद है सम्मान बचाना,
ना मैंने जाना किसी को ना किसी ने मुझे पहचाना।।

रविवार, 24 अगस्त 2014

मेरे मित्र २३ अगस्त २०१४

कुछ मित्रों ने हाथ बढा़या और छोड़ दिया,
संदेश दिया ओर लिया और बात करना छोड़ दिया,

यूँ तो मिलते है राह में कई हम नशीं,
जाने आपमें क्या देखा हमने आप लगी अपनी सी।

आप को देखा तो ख्वाब संजो लिए,
ख्वाब में हमको मिली दीवानगी आप साथ हो लिए,

ख्वाब में ही जिंदगी के बीज बो लिए,
ना कि बात जब साथी ने हम भी चुप हो लिए,

कर हिम्मत फिर से बात कि कोशिश के लिए,
आखों से जरिये बात के  लिये इशारे हो लिए ,

इशारों ही इशारों मे मुलाकात का तय समय कर लिया,
सपने मे तो अच्छा था तय कर हकीकत मे ऐतबार कर लिया,

उठा जो सपने से हकीकत से मुलाकात हो गयी,
सोची भी ना थी जो उनसे वही बात हो गयी,

मुँह फेरकर चले जब वो ख्वाब सा अहसास करा दिया,
जज्बातों को रखना संभाल कर दुनिया है मतलब की बता दिया।

कुछ मित्रों ने हाथ बढा़या और छोड़ दिया,
संदेश दिया ओर लिया और बात करना छोड़ दिया,