चाहे कितना भी पाबंद हो निगाहों में,
मौका मिलते ही डसता जरूर है,
पाला हो जब साँप अपनी ही बाहों में,
हैं लोभी जो किसी भी हनक का,
धोखा देगा वक्त पर लोभ की सनक में,
संभलकर रहना राजगीरों से,
विष बाँट देगा पता न होगा सपनों में,
दुश्मनी पाली हैं सियासतदाँ से,
हर शख़्स को रखना निगाहों में,
हज़म न होगा उसे तेरा अम्बर छू जाना,
जिसे महात्मा समझा हैं विचारों में ।।
पुष्पेन्द्र सिँह मलिक "नादान"